दहशतगर्दों के लिए केवल मृत्युदंड ही उचित

देश के सर्वोच्च न्यायालय ने देश के स्वाभिमान को बरकरार रखते हुए ये बता दिया कि कानून किसी भी तरफ से लाचार नहीं है।  देश के कुछ गिने चुने बुद्धिजीवियों ने भले ही इन्साफ के तराजू को झुकने के लिए मजबूर करने की कोशिश की हो लेकिन देश के सबसे बड़े न्यायालय ने ऐसा होने नहीं दिया। गर्व की बात है कि इन्साफ अभी भी है और जिसने भी देश की शान्ति भंग करने का प्रयत्न किया है, उसके लिए कड़ी से कड़ी सज़ा भी निश्चित है।

चारों तरफ हड़कम्प मचा हुआ है। बेचैनी का माहौल है। किन्तु प्रशन यह उठता है कि किसके लिए है ये इतनी बेचैनी? क्यों इतनी चिंता की जा रही है? वो भी उस आतंकी के लिए जिसने सारे देशवासियों के दिल को धमाकों की गूँज से दहला दिया था। जिसने अपने परिवार के सदस्यों को दहशत फैलाने के नापाक मकसद में लगा दिया हो। और दहशत फैलाने के लिए उसी जगह को चुना जहाँ पर अधिकतर स्कूल के बच्चे मौजूद हों। मुंबई शहर के सेंचुरी बाजार की ही घटना पर गौर कर ले तो आपकी आत्मा कांप जाएगी कि वहां याकूब मेमन और उसके साथियों ने इस बात की रैकी(जांच) की थी कि धमाका करने के लिए किस जगह पर बारूद भरा जाए ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग मारे जा सकें। याकूब ने बाजार के मैनहोल में विस्फोटक भरवाया था, जिसके ऊपर से स्कूल बस के गुजरते ही बम फटा था। सिर्फ इसी जगह पर मरने वालों में 100 से अधिक बच्चे, महिलाएं तथा कुछ बुजुर्ग भी थे।

यह बात नहीं समझ आती कि हम दिन रात याकूब की सज़ा-ए-मौत पर चिंता जाहिर करके, एक आतंकवादी पर दया दिखाकर आखिर साबित क्या करना चाहते थे? क्या उन धमाकों में मारे गए लोगों की चीखों को अनसुना किया जा सकता है? 22 वर्ष बीत गए, किसी को नहीं पता था के याकूब कहाँ है, उस पर कौन-कौन सी धाराएं लगाई गयी हैं? अब अचानक से कानून में कमियां निकलने वाले समझदार लोग पता नहीं कहा से सामने आ गए। सबको यह समझना चाहिए कि कानून आखिरकार न्याय के लिए बना है। किसी का जेल में व्यवहार अच्छा है, वो जेल में लोगों को पढ़ा लिखा रहा है  तो इसका अर्थ यह तो कतई नहीं है कि उसने जितनी भी हत्याएं की हों उसके लिए उसे सख्त सज़ा ना दी जाये। तो फिर क्यों ऐसा माहौल पैदा करने की कोशिश की जा रही है जैसे फांसी किसी आतंकवादी को नहीं बल्कि किसी निर्दोष को दी जा रही हो। दहशतगर्दों के लिए तो मृत्युदंड ही उचित सज़ा है।

इस बात में कोई संदेह नहीं है और ना ही होना चाहिए कि न्याय पर पहला अधिकार पीड़ित का है। लेकिन किसी ने भी यह जानना जरूरी समझा कि मुंबई बम धमाकों में जो लोग शिकार हुए थे उन्हें इन्साफ मिला या नहीं? उनके दर्द के बारे में सोचने वाला कोई भी नहीं है, ना ही उन लोगों के पास जा कर किसी ने यह जानने की कोशिश की कि याकूब मेमन की फांसी को वो किस नज़र से देखते हैं?  बस सबको उस दहशतगर्द आतंकी को बचाने में दिलचस्पी थी। बड़ी तादात में लोग, कुछ पार्टियों के नेता और खुद को कुछ ज्यादा ही समझदार समझने वाले बुद्धिजीवी लोगों में केवल इस देशद्रोही को बचाने की होड़ लगी रही। ये सब ड्रामा हुआ भी तब जब देश के सर्वोच्च न्यायालय की ही विस्तारिक बैंच के जज याकूब मेमन की फांसी को रोकने के लिए साफ़ मना कर चुके हों। देश के महामहीम राष्ट्रपति भी दया याचिका को खारिज कर चुके हों।

पूरे देश को दहला देने वाले आतंकी के बचाने के लिए दया याचिका को कभी राष्ट्रपति के पास फिर राष्ट्रपति के पास, फिर राज्यपाल फिर सर्वोच्च न्यायालय पता नहीं कहाँ-कहाँ ले जाया गया। काश किसी पीड़ित के लिए कोई ऐसा कर पाता। किसी गरीब को न्याय दिलाने के लिए कोई इतनी दौड़ धूप करता। किन्तु गरीब पीड़ित तो सालों तक केवल अर्जियां ही दाखिल करता रह जाता है। देश के सबसे बड़े न्यायालय को रात भर जारी रखने में सफल क़ानून के रक्षक किसी पीड़ित को इन्साफ दिलाने के लिए भविष्य में ऐसा दोबारा कर पाये तो इस बड़ी बात कोई और नहीं हो सकती। लेकिन फिलहाल तो ये सोचना भी मुश्किल हो रहा है कि कभी ऐसा होगा।

अभी फांसी पर दया याचिका को एक जगह से दूसरी जगह पर घुमाया ही जा रहा था कि एक नए मुद्दे ने टूल पकड़ लिया। याकूब को गिरफ्तार नहीं किया गया था उसने आत्मसमर्पण(सरेंडर) किया था। पाकिस्तान के खिलाफ सबूत जुटाने में याकूब का बेहद योगदान था। इसलिए उसे फांसी की सज़ा नहीं दी जानी चाहिए। लेकिन अब सीधी सी बात ये है कि किसी को भी यह अधिकार दिया किसने? क्या पाकिस्तान के विरुद्ध सबूत जुटा देने का मतलब ये है कि याकूब मेमन द्वारा की गयी 257 हत्याएं भी माफ़। हद है।

जो लोग सज़ा-ए-मौत की माफी के पक्ष में थे, उनके बारे में कुछ भी नहीं कहा जाए सकता कि देश के प्रति उनकी भावनाएं ज़िंदा है या मर चुकी हैं किन्तु इतना जरूर पता है कि देश इसे कभी माफ़ नहीं कर सकता। खून के लाल रंग में लथपथ मुंबई की वो 12 मार्च, 1993 की तस्वीर को कोई भी नहीं भुला सकता।