गुजरात सरकार की कमियों की कहानी है पटेल आरक्षण आंदोलन

आरक्षण, एक ऐसा मुद्दा जिसने देश को जातिवाद के रंग में रंगने का काम बखूबी किया है। आरक्षण जाति के तौर पर सरकार से मिलने वाला एक ऐसा प्रसाद है जिसने देश के लोगों को काम करने की बजाये इस ओर ज्यादा प्रोत्साहित किया है कि बिना मेहनत किये या कम मेहनत किये कुछ हासिल करना है तो आरक्षण को हक़ मानकर उसके लिए मांग शुरू कर दो। जाति को आधार बनाकर राजनीति करने वालों ने भी आरक्षण को हथियार बनाकर लोगों को बांटने का काम बखूबी किया है। पिछले कुछ समय में आरक्षण मांगने वाली विभिन्न जातियों के लोगों ने सरकार को झुकाने के लिए आरक्षण का अलाप कई बार गाया है, फिर भले ही वो लोग आर्थिक तौर पर समृद्ध हो या कमज़ोर। हरियाणा के जाट समुदाय का आरक्षण की मांग तथा गुजरात का पटेल आंदोलन इसके सटीक उदाहरण हैं।  ये दोनों समुदाय आर्थिक रूप से समृद्ध हैं किन्तु आरक्षण की मांग पर अड़े हैं।

395553-hardikpatelअहमदाबाद में उमड़ा पटेल समुदाय के लोगों का विशाल हजूम इस बात की और इशारा करता है कि आरक्षण की मांग को लेकर पटेल अब एकजुट हो गए हैं। पटेल समुदाय गुजरात में आर्थिक रूप से काफी समृद्ध लोगों का समुदाय है। तो आखिरकार ऐसा क्या हुआ कि अचानक से यह समुदाय आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन पर उत्तर आया? किसने इतने बड़े जनसैलाब की नींव रखी? गुजरात में इन दिनों आरक्षण की आग भड़की हुई है जिसका नेतृत्व कर रहा है एक 25 साल का लड़का। इस 25 साल के लड़के ने पूरे गुजरात की राजनीति को हिलाकर रख दिया है। इस नौजवान ने गुजरात में अबतक 80 से ज्यादा रैलियां की हैं। गुजरात में तूफ़ान बनकर आए इस शख्स का नाम है “हार्दिक पटेल। 2 महीने पहले तक परिवार, दोस्तों और पड़ोसियों के अलावा शायद ही कोई हार्दिक को जानता हो। 2 महीने के इस वक्त में साधारण कद-काठी के इस युवा ने पाटीदार आरक्षण आंदोलन के झंडे तले जो जनसैलाब इकट्ठा किया है, वह अभूतपूर्व है।

आरक्षण को लेकर हार्दिक ने इस आंदोलन कि शुरुआत तब की जब वो खुद इसका शिकार बना। उसके पड़ोसी लड़के को कम नंबर के बावजूद सरकारी नौकरी मिल गई और वो मुंह देखता रहा। हार्दिक ने जब युवाओं की बात को मंच पर उठाना शुरू किया तो उसे मंझे हुए नेताओं ने भी तवज्जो नहीं दी। तब हार्दिक ने बीते जुलाई में “पाटीदार अनामत आंदोलन” की नींव डाली। उन्होंने पटेल समुदाय के युवाओं के साथ आरक्षण के नाम पर हो रहे भेदभाव के खिलाफ बिगुल बजाते हुए सरकार को चेतावनी दे दी कि यदि पटेल जाती को अन्य पिछड़ा वर्ग(ओबीसी) की श्रेणी में नहीं लाया गया तो 2017 के विधानसभा चुनाव में “कमल” नहीं खिलने देंगे। “पाटीदार अनामत आंदोलन समिति” के नेता हार्दिक पटेल की इस चेतावनी ने से भाजपा के माथे पर पसीने की नदी बहा दी है। पटेल समुदाय का भाजपा की जीत में हमेशा से ही विशेष योगदान रहा है। पटेल समुदाय समृद्ध, दबंग तथा संख्यात्मक रूप से प्रभावशाली है।

प्रशन यह उठता है कि गुजरात में आरक्षण की मांग करने वाला यह जनसमूह अचानक से कहाँ से निकल आया? अहमदाबाद में 10 लाख से भी ज्यादा पाटीदार क्या रेगिस्तान में उड़ने वाले तूफ़ान की तरह आ गए थे? 1985 में ओबीसी आरक्षण का सबसे अधिक विरोध करने वाले ही आखिर अचानक से आरक्षण के मांग क्यों करने लगे? यहाँ अचानक का मतलब 50 दिन के बहुत ही कम समय से है। बीते 6 जुलाई से पहले तो उजरात में आरक्षण के विषय में चर्चा तक नहीं थी, ना इतना बड़ा जनसैलाब एकजुट था, ना ही आरक्षण को लेकर किसी प्रकार का गुस्सा।

छः जुलाई को मेहसाना में पटेल समुदाय के लोगों की एक रैली हुई, जिसमें 5000 लोग इकट्ठे हुए। किन्तु इस रैली को ना तो नेताओं ने तवज्जो दी, ना पुलिस ने और ना ही मीडिया ने। 2 दिन बाद मेहसाना के पास ही विषनगर में दूसरी रैली हुई। जुटे तो यहाँ भी तकरीबन उतने ही लोग लेकिन मीडिया में यह मुद्दा उस समय सामने आया जब विषनगर के पाटीदारों ने अपने गुसैल स्वाभाव का परिचय देते हुए वहां के विधायक ऋषिकेश पटेल के दफ्तर पर हमला कर दिया। तब जाकर मीडिया का ध्यान इस और गया। अखबारों में इसकी थोड़ी बहुत चर्चा हुई। आरक्षण आंदोलन भी सबकी नज़रों में अाया और हार्दिक पटेल भी।

विषनगर की इस रैली के बाद तो जैसे तूफ़ान ही आ गया। जिला व तहसील स्तर  पर रोज छोटी छोटी रैलियां करके पाटीदारों को इकट्ठा करने का प्रयत्न किया गया। पटेलों की लगातार रैलियां होने लगीं और लगातार घोषणाएं भी सामने आने लगीं। जिसके बाद इन्होने सूरत में बड़ी रैली करनी की घोषणा की। जिसका मुख्य उद्देश्य सूरत व उसके आसपास के पाटीदारों का समर्थन हासिल करना था। 7 लाख के करीब पाटीदार सूरत में इकट्ठा हुए। ये सब रैलियां शांतिपूर्ण तरीके से हुयी, इसलिए इन रैलियों में जुटने वाली भीड़ ने पाटीदारों के हौसले को और बड़े पंख लगा दिए। इतनी संख्या में पाटीदारों को खुद के विरुद्ध खड़ा देखकर सरकार के पसीने भी छूटने लगे। जिस दिन सूरत रैली हुई, उसी दिन पटेल समुदाय के नेताओं को सरकार ने बातचीत का न्यौता दिया। किन्तु आनंदीबेन पटेल सरकार के लिए उनकी आरक्षण की मांग को स्वीकार कर लेना आसान नहीं है। इसलिए गुजरात सरकार ने भी कह दिया कि “अनामत तो नहींज मिले” मतलब “आरक्षण तो नहीं मिलेगा”।

सरकार के  इस इनकार से पटेलों ने अपने स्वर में आक्रोश भर लिया और उन्होंने उसके बाद यह घोषणा कर दी कि 25 अगस्त को अहमदाबाद में होने वाली महारैली से पहले सरकार से कोई बातचीत नहीं होगी। इस रैली में पहले से भी अधिक भीड़ जुटी। 10 लाख से भी ज्यादा पाटीदार इस रैली में शामिल हुए। जहाँ सब रैलियां शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुयी थी वहीँ इस रैली ने हिंसक रूप ले लिया। जिसमें 8 लोगों की जान भी चली गयी।

लेकिन क्या सरकार कि गलतियों को अनदेखा किया जा सकता है? या यूं कहा जा सकता है कि सरकार की कमियों की कहानी ही है पटेल आरक्षण आंदोलन? क्या गुजरात जातिवाद राजनीति में प्रवेश कर रहा है? लेकिन इसका जिम्मेदार कौन हैं? आरक्षण की आग को हवा देने में भाजपा का भी पूरा योगदान है। सत्ता में आने के बाद नरेन्द्र मोदी सरकार ने जाट आरक्षण तथा महाराष्ट्र में फड़नवीस सरकार ने  मराठा आरक्षण पर रूख तय करते हुए पूर्व कांग्रेस सरकारों के मजबूरी में उठाए गए क़दमों का कोर्ट में बचाव किया, जिस पर कोर्ट ने उन्हें कड़ी फटकार लगायी। लेकिन केंद्र अब तक इन समृद्ध तथा दबंग समुदायों को आरक्षण देने का समर्थन कर रहा है। तो फिर कैसे पटेल, ब्राह्मण तथा अन्य जातियां आरक्षण की मांग पर पीछे रह सकती हैं?

पटेलों के इतना बड़ा आंदोलन सरकार की कमियों की पोल खोलने के लिए काफी है। सरकार के पास बातचीत का पर्याप्त समय था। सरकार चाहती तो रणनीति भी बना सकती थी और पटेलों से बातचीत का दौर भी जारी रख सकती थी। लेकिन किसी ने कुछ न सोचा और ना किया, और दो टूक जवाब देकर इतने बड़े आंदोलन को जन्म दे दिया। सरकार के पास इस समस्या से निपटने की अपनी कोई तैयारी नहीं थी। सरकार केवल पाटीदारों की भीड़ से डरकर बौखला रही थी। करना क्या है, यह बिलकुल भी स्पष्ट नहीं था। सरकार की बोखलाहट पर पुलिस ने भी मुहर लगा दी। सरकार के बाद पुलिस ने भी अहमदाबाद रैली को हिंसक रूप लेने में अपना योगदान दे दिया।

सभी रैलियों की तरह अहमदाबाद रैली भी शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुई। सब लोग अपने घर को लौट रहे थे। जीएमडी मैदान पर जहाँ हार्दिक पटेल धरना दे रहे थे वहां केवल 4000 पाटीदार ही बचे थे, लेकिन पुलिस ने अपनी बौखलाहट का परिचय देते हुए वहां लाठीचार्ज कर दिया। यह खबर आग की तरह फैल गयी और पटेल समुदाय के जो लोग अभी घर भी नहीं पहुंचे थे, उन्होंने वही तोड़फोड़ शुरू कर दी। जहाँ से गुजरात में हिंसा ने जन्म ले लिया। रैली से पहले सरकार ने रैली में पहुँच रहे लोगों के टोल टैक्स ना देने तथा रैली के पुख्ता इंतज़ाम, सुरक्षा जैसी कई मांगों को मान लिया था तो फिर सरकार को इतनी जल्दी हार्दिक की धरपकड़ करने की क्या जरूरत आन पडी थी। देर रात तक गुज़रात की मुख्यमंत्री भी इस पर अपनी सफाई देती रही कि यह निर्णय पुलिस का है लेकिन तब किसको सुननी थी, हिंसा तो जन्म ले चुकी थी।

सरकार को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना होगा। उन्हें इस समस्या के निपटारे की रणनीति सुनिश्चित करनी होगी। उन्हें पटेल समुदाय के लोगों से लगातार बातचीत करनी होगी। आरक्षण मामले में सिद्दांतनिष्ठ और समरूप रवैया ना अपनाने के कारण ही गुजरात सरकार इस नयी राजनीतिक मुसीबत में फसी है। सरकार को यह समझना होगा कि पटेलों को आरक्षण देने से अन्य समाज भी इसके लिए सक्रिय होंगे। सरकार को अपनी गलतियों से सबक लेते हुए इस विषय पर आत्म-मंथन की आवश्यकता है। अब देखना यह है कि भाजपा और अन्य पार्टियां इससे कोई सबक लेंगी? गुजरात सरकार को पुलिस के रूख पर भी कार्यवाही सुनिश्चित करनी होगी ताकि पाटीदारों से बातचीत के दौरान पुलिस के इस रवैये पर अपना पक्ष रख सके।

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फादर ऑफ़ एसएमएस

कुछ ही दिन पहले त्यौहारों पर एसएमएस भेजने का सिलसिला शायद ही कोई भूला होगा। इतने एसएमएस भेजे जाते थे कि मोबाइल नेटवर्क ही ठप्प हो जाते थे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया को एसएमएस की सौगात देने वाले शख्स कौन हैं? तो आईये हम आपको बताते हैं की वो कौन हैं जिन्होंने एसएमएस की शुरुआत की।

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फिनलैंड के “मैटी मैक्नन” ही वो शख्स थे जिन्होंने दुनिया को 160 कैरेक्टर में सन्देश भेजने का यह तोहफा दिया। मैक्नन को इस शार्ट मैसेजिंग सर्विस(एसएमएस) का ख्याल पिज्जा खाते समय आया था। 1984 में डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में एक टेलीकॉम कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने गए मैक्नन को लांच के दौरान पिज्जा खाते समय ये ख्याल आया कि यदि मोबाइल बंद हो जाए तो किसी से कैसे संपर्क किया जाए? कॉन्फ्रेंस में मौजूद लोग अभी जवाब सोच ही रहे थे कि मैक्नन ने “टैक्स्ट मैसेज सर्विस” का कॉन्सेप्ट सबके सामने रखा लेकिन सबने इसे खारिज कर दिया।

1985 में शोधकर्ता फ्रीडहैम हिलब्रांड और उनकी टीम के साथ मिलकर मैक्नन ने शार्ट मैसेजिंग सर्विस पर चुपचाप काम करना शुरू कर दिया। 1992 में पहला एसएमएस भेजा गया तथा 1994 में नोकिया का मैसेज टाइपिंग वाला पहला फोन लॉन्च हुआ जिसके बाद एसएमएस के सर्विस पूरी दुनिया में लोकप्रिय हुई। मैसेज भेजने कि सर्विस भले ही “शार्ट मैसेजिंग सर्विस” के नाम से लोकप्रिय हुई थी लेकिन वो इसका नाम मैसेज हैंडलिंग सर्विस ही मानते थे। वे इसे कम शब्दों में सन्देश भेजने का जरिया मानते थे। उनके लिए यह भाषा के विकास का नया तरीका था। मैटी मैक्नन ने इस टेक्नोलॉजी से पैसा नहीं कमाया। उन्होंने इसका पेटेंट तक नहीं करवाया। “फादर ऑफ़ एसएमएस” कहने पर वो चिड़ जाया करते थे। अभी हाल ही में 63 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

राजनीति, प्रतिद्वंद्वी बनकर कीजिये दुश्मन बनकर नहीं

राजनीति एक ऐसा विशाल सागर है जिसमें छोटे बड़े राजनेता अपने प्रतिद्वन्द्वियों को हराकर सत्ता अपने हाथ में रखना चाहते हैं। राजनीतिक लिहाज़ से भले ही उनमें कई मतभेद हों लेकिन निजी तौर पर उनमें मनमुटाव नहीं होता। लेकिन भारत की मौजूदा राजनीति इसके बिलकुल विपरीत है। नरेंद्र मोदी बनाम सोनिया गांधी इसी बात का सबसे माकूल उदाहरण है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच मनमुटाव अब तक राजनीतिक रैलियों में ही नजर आता था लेकिन अब तो संसद में भी इस मनमुटाव ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है। इन दोनों राजनीतिक दिग्गजों का किसी भी बात पर आपस में असहमति जताना इस बात की पुष्टि करता है कि यह अनबन केवल राजनीतिक नहीं है बल्कि इसके पीछे कोई निजी कारण है।

हाल ही में मानसून का बर्बाद हुआ सत्र भी इसी बात की और इशारा करता है कि यह केवल पक्ष बनाम विपक्ष अथवा कांग्रेस बनाम भाजपा वाली राजनीती का नतीजा नहीं है, बल्कि यह ऐसे राजनेताओं के मनमुटाव का प्रतिफल है जो एक दूसरे को कतई पसंद नहीं करते हैं। इन दोनों के झगडे को देखकर तो ऐसा ही लगता है कि ये दोनों राजनेता एक दूसरे को राजनीतिक रूप से खत्म करने पर तुले हैं। यही कारण है कि ये दोनों दिग्गज राजनेता ना तो किसी मुद्दे पर सहमत होते हैं और ना ही आपस में कोई कामकाजी रिश्ता विकसित कर पाते हैं, भले ही उसमें जनता का हित ही क्यों ना हो। मानसून सत्र में देश को जो नुकसान हुआ, मोदी बनाम सोनिया उसका एकमात्र कारण है। इन दोनों की जिद के कारण ही संसद में लगातार गतिरोध की  परिस्थिति बनी रही।

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हालांकि राजनीति में ऐसा मनमुटाव पहली बार देखने को नहीं मिला। राज्य विधानसभाओं में ऐसा पहले भी देखा जा चुका है।  मायावती बनाम मुलायम सिंह यादव, जयललिता बनाम करूणानिधि तथा और भी ऐसे कई किस्से है जिनमें राजनीति के दिग्गजों में निजी मतभेद देखा गया है। मोदी और सोनिया की इस दुश्मनी का लंबा इतिहास रहा है। वर्ष 2007 के गुजरात चुनाव में सोनिया ने 2002 के दंगों को तूल देकर मोदी पर “मौत का सौदागर” होने की टिप्पणी कर दी थी। लेकिन नरेंद्र मोदी ने भी इसके बदले में कोई कसर नहीं छोड़ी। 2002 में उन्होंने सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को उठाकर आसान जीत दर्ज की थी। कुछ वर्ष पहले भी मोदी  ने कांग्रेस नेता को अपमानजनक ढंग से सम्बोधित किया था। इन दोनों का एक दूसरे के प्रति रवैया केवल राजनीतिक मतभेद तो नहीं हो सकता। इन दोनों की यह लड़ाई चुनावी हार जीत से बहुत परे चली गयी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषणों में कई बार कांग्रेस मुक्त भारत की बात की है। इससे इस बात को तो साफ़ तौर पर पर देखा जा सकता है कि वे कांग्रेस को केवल पराजित ही नहीं करना चाहते हैं बल्कि खत्म कर देना चाहते हैं। आरएसएस पृष्ठभूमि से जुड़े होने के कारण भी मोदी हमेशा से ही जवाहरलाल नेहरू को नापसंद करते आये हैं। इसकी झलक उनके भाषणों में साफ दिखाई देती है। उन्होंने अपने भाषणों में नेहरू के योगदान को कभी महत्त्व नहीं दिया, जबकि सरदार पटेल, सुभाष चन्द्र बोस, लाल बहादुर शास्त्री तथा महात्मा गांधी का गुणगान करते उन्हें कई बार देखा गया है। उनके भाषणों से ऐसा लगता है मानो मोदी नेहरूवादी विरासत को देश की राजनीति से हमेशा के लिए मिटा देना चाहते हों। लेकिन वे ये बात भी भूल रहे हैं कि किसी की राजनीतिक विरासत को ख़त्म कर देना भाषण देने जितना आसान काम नहीं है।

नरेंद्र मोदी भले ही जवाहरलाल नेहरू को पसंद ना करते हों लेकिन इस बात को झुठला नहीं सकते की देश का पहला प्रधानमंत्री होने का गौरव उन्हें ही प्राप्त है और राजनीति में उनके योगदान भाषणों में उनका नाम न लेने से कम नहीं होगा। इसलिए उनके नाम को देश की राजनीति से मिटाना समझदारी का नहीं अपितु द्वेष का प्रमाण होगा। सोनिया गांधी ने भी समय रहते शायद इसे भांप लिया है, तभी तो अचानक कांग्रेस की कमान अपने हाथों में ले ली है, साथ ही पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भरते हुए उन्हें मोदी से ना डरने के लिए प्रेरित भी करती नज़र आ रही हैं। संसद में मानसून सत्र के दौरान उनका आक्रोश भरा रूख इस बात की पुष्टि करता है। उनके सख्त रवैये ने इस बात को तो साफ़ बता दिया कि खुद के संरक्षण तथा परिवार की विरासत बचने के लिए वे कुछ भी कर सकती हैं। मोदी को कड़ी चुनौती देने के लिए इसीलिए सोनिया गांधी बार बार मोदी की धर्मनिरपेक्षता को कटघरे में खड़ा कर देती है। आरएसएस से जुड़े होने के कारण मोदी को भी इस पर मौन रहना पड़ता है।

मनमुटाव की वजह कोई भी हो। दलील कोई भी दी जा सकती है। चाहे मोदी, सोनिया गांधी के विदेशी मूल की होने की अपनी नफरत को पचा नहीं पा रहे हो या दूसरी तरफ सोनिया गांधी मोदी के प्रधानमंत्री बनने को अभी तक स्वीकार नहीं कर पायी हो। असलियत यही है कि 2002  से चली आ रही इस लड़ाई में देश का बहुत नुकसान हो चुका है। नरेंद्र मोदी अब बहुमत दल कि सरकार के प्रधानमंत्री है तथा सोनिया गांधी सबसे बड़े विपक्ष दल कि अध्यक्ष। दोनों को राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बनकर काम करना होगा दुश्मन बनकर नहीं। दोनों देश कि राजनीति में महत्वपूर्ण रुतबा रखते हैं। इसलिए दोनों को एक दूसरे से व्यवहार करना आना चाहिए। एक दूसरे के प्रति लगातार मनमुटाव उत्पन्न करके संसदीय व्यवस्था को शर्मसार करने कि बजाये मिलकर देश कि राजनीति में अपना योगदान दें, जिससे देश नुकसान से भी बच जाएगा और जनता के हित के बारे में भी सोचा जा सकेगा।

नमो की विदेश नीति कितनी सफल?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी(नमो) ने अपने विदेशी दौरों का सिलसिला अभी तक जारी ही रखा है। इसके पीछे उनका उद्देश्य दूसरे देशों द्वारा भारत में निवेश करवाना या निवेश को पहले से अधिक बढ़ाना है। उनकी इस कोशिश से भारत विश्व में अंतराष्ट्रीय बाजार के तौर पर अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है। नमो की विदेश यात्राओं ने एक तरफ जहाँ भारत को विश्व में अलग पहचान दिलाई है वहीँ विश्व भर के निवेशकों को भारत की तरफ आकर्षित भी किया है। इसके लिए उन्होंने चुना भी उन देशों को है जो पिछली सरकारों की प्राथमिकता सूची में या तो कभी आये ही नहीं या फिर सूची में उनका स्थान बहुत नीचे था। प्रधानमंत्री ने अपने विदेशी दौरों द्वारा उन देशों से समन्वय स्थापित करने का प्रयत्न किया है जिन्होंने भारतीय बाजार में कभी निवेश करने पर शायद विचार तक भी ना किया हो।

प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं का समझदारी से अध्ययन किया जाये तो कुछ महत्वपूर्ण बातें है जो निकल कर सामने आती हैं। अपनी यात्राओं को उन्होंने सबसे अधिक विदेशी निवेश को आकर्षित करने पर केंद्रित रखा है। विदेश में रहने वाले भारतीयों/भारतीय मूल के नागरिकों में नया उत्साह भर दिया है। नमो ने उन्हें इस बात का भरोसा दिलाया है कि विश्व भर में बसे भारतीय हमारे देश का अभिन्न अंग हैं। वो हमारे थे और सदा रहेंगे। मोदी ने भारतीय मूल के लोगों को यह भरोसा दिलाया है कि हम ना तो उन्हें भूले हैं और ना कभी भूलेंगे। यही सब बातें उनकी संयुक्त अरब अमीरात(यूएई) की यात्रा में भी देखने को मिली। यूएई 1971 में अपने गठन के बाद से ही भारतियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। यही वजह है कि वहां की तकरीबन 94 लाख जनसंख्या में करीब 24 लाख लोग भारतीय मूल के हैं। इसके  बावजूद पिछली सरकारों में इंदिरा गांधी के बाद नरेंद्र मोदी ही केवल ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने संयुक्त अरब अमीरात का दौरा किया है। इंदिरा गांधी 1981 में यूएई आयीं थी। इसलिए मोदी ने भी मौके को खूब संभाला तथा यह बोलकर वहां के लोगों का दिल जीत लिया कि “वो 34 वर्षों की कमी को पूरा करने आये हैं”।

भले ही अपने भाषण में नमो ने वहां रह रहे भारतीयों की तारीफ के पुल बांधे हों लेकिन उनका लक्ष्य निवेशकों को लुभाना ही रहा। उन्होंने निवेशकों को यह भरोसा भी दिलाया कि भारत में तुरंत एक ख़राब डॉलर के निवेश के अवसर हैं। साथ ही उन्होंने इस बात का भरोसा भी दिलाया कि भारतीय बाजार में पैसा लगाना उनके लिए फायदे का सौदा ही होगा। प्रधानमंत्री ने निवेशकों का ध्यान इस और भी दिलाया कि अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक तथा क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज जैसे संस्थानों के अनुसार भारत विश्व की सबसे तेज बढ़ रही अर्थव्यवस्था है, जहाँ पैसा निवेश करने पर केवल मुनाफ़ा ही होगा। यूएई में मौजूद भारतीयों की तारीफ करते हुए नमो ने यह कहा कि भारतीयों ने यहाँ अपने श्रम और क्षमताओं का परचम पहले ही लहरा रखा है। मोदी ने अपने भाषण से वहां के लोगों का दिल इस प्रकार जीता कि उन पर यकीन करना किसी के लिए भी कठिन नहीं रहा होगा। अब नमो की विदेश नीति कितनी सफल होती है ये तो वक्त ही बताएगा, किन्तु उन्होंने वहां के लोगों में भारत में निवेश के प्रति विश्वास जरूर जगा दिया। यूएई के निवेशक भारत में कितना तथा किस प्रकार निवेश करते हैं यह काफी कुछ देश के अंदरूनी माहौल पर निर्भर करता है। फ़िलहाल तो केवल यही आशा की जा सकती है कि प्रधानमंत्री की विदेश नीति देश को विकास के मार्ग पर ले जाने में सहायक सिद्द होगी।

स्वतंत्रता दिवस पर विशेष- आज़ादी के मायने

तमाम तरह की सजावट से लैस दिल्ली का लाल किला जहाँ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तिरंगा फहराकर देश को सम्बोधित किया। लाल किले के प्राचीर से यह उनका दूसरा सम्बोधन था। बच्चों में अपने प्रधानमंत्री से बात करने का उत्साह लाल किले पर आज देखा जा सकता था। मोदी जी से मिलने की खुशी से यह साफ़ जाहिर हो रहा था कि मानो बच्चों को प्रधानमंत्री से न जाने कितनी उम्मीदें हैं। और ऐसा होना भी चाहिए। देश के भविष्य को अपने देश के प्रधानमंत्री से उम्मीदें होनी जायज है। किन्तु जिस उज्जवल भारत के सपने ये छोटे-छोटे बच्चे देख रहे हैं उसे पूरा करने के लिए मौजूदा सरकार तत्पर भी है या फिर उम्मीदों के सपने देखकर ये बच्चे स्वयं के साथ ही धोखा कर रहे हैं। आज लाल किले पर सब कुछ वैसा ही हुआ जैसा एक वर्ष पूर्व हुआ था। ऐसा लग रहा था मानो सब कुछ एक कागज़ पर लिखा गया हो और उसे क्रमवार दोहराया जा रहा हो। प्रधानमंत्री का तिरंगा फहराना, उमीदों से भरा भाषण, बच्चों से मिलकर उनमें उत्साह भरना आदि सब पहले जैसा ही था।

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आजादी के दिन को पूरे देश में बहुत धूमधाम से मनाया जा रहा है। खासकर सरकार 15 अगस्त के इस दिन के लिए विशेष तैयारियों में जुटी नज़र आयी। स्कूलों, सरकारी संस्थानों, महाविद्यालयों, विश्विद्यालयों आदि में हर जगह तिरंगा लहराया नज़र आया। कहीं देश में “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” अभियान के अंतर्गत बेटियों से ही तिरंगा फहराया गया। क्या तिरंगे की शान में चार चाँद लगाने के लिए केवल एक ही दिन है, 15 अगस्त का? यदि सरकारें आजादी न मनाये तो क्या देश में इस दिन का इतना उत्साह देखने मिल सकता है? सच माने तो ऐसा नहीं होगा। देश इस समय इतना गरीबी, सुरक्षा, महंगाई से परेशान नहीं है जितना इस देश की सरकारों से है। देश के लोगों के पैसों पर भारी सुरक्षा के साथ बड़ी बड़ी गाड़ियों में घूमने वाले नेताओं की क्या यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि वो अपने निजी झगड़ों से हटकर देश के हित के लिए एक साथ आगे आएं। क्या पिछले दिनों मानसून सत्र में संसद में मचे हंगामे से देश वाकिफ नहीं है? बेवजह अपनी लड़ाई और जिद को जनता के हित में सही बताने का अधिकार है उन्हें? संसद में काम में अवरोध उत्पन्न करके जिस पैसे की बर्बादी की जा रही है वो उनकी जेब से खर्च हो रहे हैं? लेकिन इन सरकारों ने देश का जो हाल इस समय बना रखा है, उसके हल के लिए कोई प्रयास होते हीं दिखते। ऐसे में देश की जनता क्या करे? एक सरकार ने उम्मीदें तोड़ी तो दूसरी सरकार को मौका दिया, लेकिन उनके सिपेसालार ने तो साल भर में विदेश यात्राओं की ऐसी झड़ी लगाई कि देश के लोगों के लिए प्रधानमंत्री के दर्शन करने ही दुर्लभ हो गए।

कहने को हम आजाद हैं लेकिन यह आज़ादी केवल कागज़ों में ही सीमित नहीं रह गयी है? सोशियल मीडिया, अखबारों में, टीवी चैनलों पर स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें जोरों शोरो से दी जा रही हैं। लेकिन लगता तो ऐसा है कि आजादी केवल देश के राजनेताओं तक ही सीमित रह गयी है। कुछ भी बोलने की आज़ादी। एक दूसरे पर कीचड उछालने की आज़ादी। संसद में हंगामा करने की आज़ादी। बाकी सब तो आज भी गुलाम ही हैं। गरीब महंगाई का गुलाम है तो किसान कर्ज की ज़ंजीरों तले दबा है। कहीं देश प्रकृति का कहर झेल रहा है तो देश की सीमा पर खड़े जवान दिन रात गोलाबारी का सामना करके शहीद हो रहे हैं। ऐसे में आज़ादी के मायने समझना बहुत मुश्किल हो गया है। सरकारें तो देश की आज़ादी का उत्सव मना रही हैं लेकिन देश की सीमा पर गोलाबारी का सामना करने वाले जवानों को शायद आज की तारीख भी याद ना हो। उन्हें तो केवल अपनी भारत माता की रक्षा करना और उसके लिए मर मिटना ही याद है।

मेरे लिए तो देश की आजादी के इस दिन के कोई मायने रह ही नहीं जाते, जब देश के जवान इस दिन पर मिठाइयां तक नहीं बाँट पाते। जिन पर देश की सुरक्षा का जिम्मा है ताकि देश के लोग आज़ादी को खुलकर जी सकें, यदि वो ही उदास हैं तो क्या मायने निकलते हैं इस आज़ादी के? क्या उन देश वासियों को इस आज़ादी के सुख का मजा लेने का कोई अधिकार नहीं है जिनके परिवार का कोई न कोई सदस्य देश की सीमा पर तैनात है?  इस सबके बावजूद देश की सरकार कोई सख्त रूख अपनाने की बजाये दुश्मन देश की तरफ बातचीत का हाथ बढ़ा देती है जिसे वह हर बार ठुकरा देते हैं। देश में लगातार हमले हो रहे हैं। देश की शांती को भंग करने का निरंतर प्रयास जारी है। देश में हर तरफ चिंताजनक माहौल है और बात करते हैं आज़ादी  की। आखिर क्यों सबकुछ लाचार सा प्रतीत होता है? आज भी आज़ादी के मायने बिलकुल भी नहीं बदले हैं जिनसे हमारा देश आज आजादी के 68 साल बाद गुज़र रहा है। बल्कि अधिक खतरनाक हो चले हैं। ऐसा लगता है मानो पूरी आजादी सिमट कर समस्याओं के कब्जे में आ गई हों और छटपटाती हुई अपनी प्राण रक्षा के लिए पुकारती हो।

क्या कोई स्पष्ट रूप से बता सकता है कि आखिर हम आज़ाद हैं क्यों? आखिर होती क्या है ये आज़ादी? इसे हम त्यौहार की तरह क्यों मनाएं? क्या राजनेताओं के सिवा कोई और भी जानता है इसका अर्थ? लाल किले के प्राचीर से हुई लुभावनी घोषणाएं जनता के लिए इतनी मायने नहीं रखती जितनी सत्ताधारियों के लिए रखती है। सत्ता आपके पास है। बहुमत आपके पास है। जनता आपकी है और आपको टकटकी लगाए देख रही है। सबकुछ तो है फिर कौनसी वजह है कि इन डेढ़ वर्षो में जमीनी स्तर पर नतीजे  में सिर्फ बाबा जी का ठुल्लु ही हाथ लगा है। सीमापार बैठे लोग रोज आपको धमकिया दे रहे हैं। एक शांती का दुश्मन देश आपकी छाती पर मूंग दल रहा है।आपकी भारत माता के शीश कश्मीर को अपने पंजे में लेकर नोचने खरोंचने का प्रयत्न करता है। फिर क्या वजहें हैं कि अलगाववादियों की ताकत आपकी ताकत से अधिक जान पड़ रही है। वो भी तब जब आप दिल्ली में बैठे ही इस इरादे से थे कि आप कश्मीर को अपना हिस्सा और आतंकवाद को ख़त्म कर देंगे. तब आखिर क्या कारण है कि आतंकवाद के मामले पर आप अपना पक्ष मजबूती से रख ही नहीं पा रहे?

फिर भी देशवासियों के पास फिलहाल आपसे उम्मीदें लगाए रखने की जगह कोई विकल्प नहीं है। आपको समय दिया है तो उस समय का सदुपयोग करने की जरूरत को समझिए। क्योंकि बदलाव और अच्छे दिन की आस नई सरकार पर विश्वास के कारण है। इस विश्वास को न सिर्फ बनाए रखने बल्कि उसे साकार करने की जरूरत है। आज़ादी केवल कागज़ों की रौनक ना बढाए बल्कि देशवासियों के दिल में उमंग और उत्साह भर दे। आज़ादी के इस दिन यही कामना है कि लालकिले से जो घोषणाएं की गयी है वो सत्यता में परिवर्र्तित हो जाएं. और खुशी और आज़ादी का असली माहौल देश में दिखाई दे।

माना गीदड़ भभकी, लेकिन इसे गंभीरता से ले सरकार

एक खत और माहौल तनावपूर्ण। देश की न्यायपालिका में एक बार फिर से उस समय तनावपूर्ण स्थिति पैदा हो गयी जब सुप्रीम कोर्ट के जज दीपक मिश्र को
जान से मारने की धमकी वाला खत मिला। ये खबर और भी चिंताजनक इसलिए भी हो जाती है क्यूंकि दीपक मिश्र सुप्रीम कोर्ट के वही जज हैं जिन्होंने याकूब मेमन की फांसी के पुष्टि की थी। इस खत में लिखा है कि “”चाहे जितनी भी सुरक्षा मिली हो, हम तुमको ख़त्म कर देंगे”। इस धमकी को अधिक गंभीरता से लेना इसलिए भी बेहद जरूरी है क्यूंकि जब 30 जुलाई को याकूब मेमन को फांसी दी जानी थी उससे तकरीबन डेढ़ घंटा पहले 1993 मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड टाइगर मेमन ने “वॉयस ओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल” के जरिये अपनी माँ से फ़ोन पर याकूब को फांसी देने वालों से बदला लेने की बात कही थी। टाइगर ने फोन पर अपनी माँ से कहा कि, ” सबके आंसू जाय नहीं जाएंगे। उनको इसकी कीमत चुकानी होगी”। हालांकि उसकी माँ ने उसे ऐसा करने से मना किया लेकिन वो लगातार अपनी बातचीत में बदला लेने की बात बोलता रहा।

इन सब बातों के बाद सरकार इस धमकी को हल्के में नहीं ले सकती। उन्हें इस बात को पूरी गंभीरता से लेना होगा और न्यायपालिका की सुरक्षा को भी सुनिश्चित करना होगा। सरकार इस बात को इसलिए भी नजरअंदाज नहीं कर सकती कि ये धमकी उन लोगों की तरफ से दी गयी है जिनके लिए बेगुनाहों का खून बहाना कोई नयी बात नहीं है। ये वही लोग है जो 22 साल पहले मुंबई में खून-खराबा मचा चुके हैं और आज भी भारत की एकता और अखन्ड्ता को तोड़ने के प्रयास में लगे हैं। हालांकि यह सबको पता है कि वो ऐसा इसलिए कर पाते हैं क्यूंकि पाकिस्तान उन्हें अपने देश में पनाह दिए हुए है। इस बात के भी पुख्ता सबूत हैं कि पाकिस्तानी सरकार भी उन्हें भारत में क़त्ल-ए-आम मचाने में सहयोग कर रही है। पाकिस्तान सरकार का हाथ इनकी पीठ पर होने की वजह से ही ये दुनिया में खासकर भारत में अपनी आतंकी गतिविधियों को बेखौफ अंजाम देने में कई बार सफल हुए हैं।

याकूब मेमन की फांसी से पहले और बाद क्रमशः दीनानगर तथा उधमपुर बीएसएफ कैम्प पर हुए आतंकवादी हमले ने न्यायमूर्ति दीपक मिश्र को दी गयी धमकी को और भी संगीन बना दिया है। पाकिस्तान भी निरंतर दाऊद इब्राहिम तथा टाइगर मेमन की मदद से भारत विरोधी आतंकवादी गतिविधियों को तेज करने में प्रयासशील है। ऐसे में इस बात को ठुकराया नहीं जा सकता कि दाऊद इब्राहिम के अंडरवर्ल्ड के लोग भारत में किसी बड़ी शख्सियत को निशाना बनाने की फ़िराक में हों। प्रधान न्यायधीश एचएल दत्तू ने निडरता का परिचय देते हुए कहा कि जजों पर न्यायपालिका की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। इसलिए जज ऐसी धमकियों से बेखौफ रहते हुए अपना काम करते है। ऐसी धमकियों से घबराने की जरूरत नहीं है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत की न्यायपालिका भविष्य में भी ऐसे अपराधियों को कड़ी से कड़ी सज़ा देने के लिए कभी पीछे नहीं हटेगी। पर सरकार किसी भी जानलेवा घटना होने का अंदेशा होने पर उसे नजरअंदाज नहीं कर सकती। केवल न्यायमूर्ति दीपक मिश्र को ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण सर्वोच्च न्यायालय, याकूब मामले से जुड़े जजों तथा गवाहों को भी कड़ी सुरक्षा मिलनी चाहिए। हालंकि सरकार ने इस धमकी भरे खत पर अपना रूख साफ़ करते हुए कहा कि देश किसी भी आतंकी की गीदड़ भभकियों से नहीं डरेगा। लेकिन माना गीदड़ भभकी ही सही पर सरकार इसे गंभीरता से ले। सरकार को लोगों के सामने ये सन्देश स्थापित करना होगा कि दहशतगर्द चाहे किसी भी रूप में छिपकर आएं, उन्हें मुहतोड़ जवाब मिलेगा। देश के न्यायपालिका की सुरक्षा में कोई भी कसर बाकी नहीं रहेगी। देश के शांतिमय माहौल व् एकता तथा अखन्ड्ता को नुक्सान पहुँचाने वाले दहशतगर्दों का अंजाम अफजल गुरु, अजमल कसाब तथा याकूब मेमन जैसा ही होगा।

इलैक्ट्रॉनिक ट्रैफिक सिग्नल का जन्म

विश्व में लगातार तेज़ी से बढ़ रहे आधुनिकीकरण ने जहाँ लोगों की ज़िंदगी को आसान बना दिया है , वही इसने कुछ समस्यायों को भी जनम दिया है। जिसमें से एक है ट्रैफिक की समस्या। जहाँ भी जाओ गाड़ियों के चहल पहल नज़र आ ही जाती है। आज के समय में नाममात्र लोग ही होंगे जो कहीं आने जाने के लिए वाहन का प्रयोग ना करते हों। हर कोई अपना समय बचाने के लिए किसी ना किसी वाहन से सफर करता है। लेकिन इस नए युग की इस सुविधा ने ट्रैफिक की समस्या उत्पन्न कर दी है। इसी समस्या के चलते लोग घंटों तक जाम में फंसे रहते हैं। कई बार तो एम्बुलैंस भी ऐसे जाम में फंस जाती है जिससे किसी की जान तक चली जाती है। लेकिन एक ऐसी तकनीक जिसने इस ट्रैफिक की समस्या को पूरी तरह से समाप्त तो नहीं किया  लेकिन काफी हद तक सुधार अवश्य दिया। इस तकनीक का नाम है ” इलैक्ट्रोनिक ट्रैफिक सिग्नल प्रणाली“. जिसे हम स्थानीय भाषा में रेड लाइट ट्रैफिक सिग्नल भी बोल देते हैं। तो चलिए जानते हैं कि इस तकनीक कआ जन्म कहाँ हुआ और कहाँ इसे सबसे पहले प्रयोग किया गया था?

तस्वीर में एक व्यक्ति ट्रैफिक सिग्नल लगाता हुआ
तस्वीर में एक व्यक्ति ट्रैफिक सिग्नल लगाता हुआ

सड़कों पर यातायात की समस्या को नियंत्रित करने का श्रेय यूनाइटिड स्टेट्स अमेरिका को जाता है। अमेरिका पहला ऐसा देश बना जहाँ पर सबसे पहले यातायात की बढ़ती तादात को आँका गया। हालांकि इस तकनीक के प्रयोग से पहले भी अमेरिका की सड़कों पर ट्रैफिक पुलिस अधिकारी यातायात को संभालते थे लेकिन अब ये उनके लिए नियत्रित कर पाना भी मुश्किल हो रहा था। इस तकनीक का मुख्य उद्देश्य ना केवल ट्रैफिक को नियंत्रित करना था बल्कि सड़क हादसों पर लगाम कसना भी था। इसका प्रयोग सबसे पहले चौराहों पर ही किया गया किन्तु आजकल कई बड़े महानगरों में इसे चौराहों के अलावा अन्य जगहों पर भी देखा जाता है, जहाँ पर लोगों की चहलकदमी अधिक है।

विश्व का पहला इलैक्ट्रोनिक ट्रैफिक सिग्नल 5 अगस्त, 1914  को अमेरिका के ओहायो राज्य के क्लीवलैंड शहर की “105  वी  एंड यूक्लिड” सड़क पर लगाया गया था। इसे “जेम्स हॉग” ने डिजाइन किया था। कुछ अन्य शहरों में सफलतापूर्वक प्रयोग के बाद 1918 में हॉग ने इसे पेटेंट करवा लिया। हालांकि अमेरिका में डिजाइन की गयी इस तकनीक से पहले भी ट्रैफिक सिग्नल लगाए गए थे। इसे 9 दिसंबर 1868 को यूनाइटिड किंगडम के लंदन में ब्रिटिश संसद के पास लगाया गया था। किन्तु यह प्रयोग सफल नहीं हुआ। ये गैस आधारित ट्रैफिक सिग्नल थे जिसमें अचानक विस्फोट हो जाता था। अमेरिकी इलैक्ट्रॉनिक ट्रैफिक सिग्नल प्रणाली  ने ट्रैफिक के नियंत्रण को ना केवल एक दिशा प्रदान की बल्कि उन पुलिस कर्मियों को भी राहत दी जो ट्रैफिक नियंत्रित करने के लिए कई बार अपनी जान तक जोखिम में डाल देते थे। जिन शहरों में इसका प्रयोग किया गया वहां जन-चेतना के लिए कई प्रोग्राम किये गए जिससे कि लोगों को इस इलैक्ट्रोनिक ट्रैफिक प्रणाली के बारे में जागरूक किया जा सके। इसमें लाल व् हरे रंग की लाईट का प्रयोग किया गया था। लोगों को इन लाइटों को लगाने का अर्थ समझाया गया। धीरे-धीरे ये तकनीत विश्व भर में प्रचलित हो गयी। आज ज्यादातार देशों में इस प्रणाली को प्रयोग किया जा रहा है.।