संसदीय गतिरोध पर सांसदों के निलंबन को नियम का रूप ले लेना चाहिए

संसद की कार्यवाही में लगातार रुकावट पैदा होने से जनता में निराशा और लाचारी की भावना पनप रही है।  संसदीय गतिरोध ने जनता को ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या संसद में मौजूद अलग-अलग पार्टियों के नेता देश के मुद्दों पर लड़ रहे हैं या अपने निजी राजनीतिक मसलों के लिए।  संसद में मूर्खों की तरह लड़ते झगड़ते हुए देश के नेताओं को देखकर जनता को यह तो एहसास हो ही गया है कि उन्होंने इन लोगों को संसद तक पहुंचाकर बहुत बड़ी भूल कर दी है।  ऐसा प्रतीत होता है मानो ये संसद में केवल एक दुसरे की पार्टी पर कीचड उछलने के लिए ही जाते हैं।  देश में क्या घट रहा है, देश किन-किन समस्यायों से झूझ रहा है, इससे इन्हें कोई लेना देना ही नहीं है।  देश में कहीं आतंकवादी घुसपैठ कर जाते हैं तो कहीं सीमा पर खड़े देश के जवान देश के लिए शहीद हो जाते हैं. कही बाढ़ की स्थिति है तो कहीं महामारी की, इस बात से तो जैसे इन्हें कोई फर्क ही नहीं पढता।  बावजूद इसके प्रत्येक पार्टीे अपने आप को देश की सबसे बड़ी हिमायती होने का दावा करने से पीछे नहीं हटती।

सोमवार को बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में संसदीय गतिरोध पर बातचीत का क्या नतीजा होना था, ये तो जनता को पहले से ही ज्ञात था।  लेकिन कांग्रेस की संसदीय दाल के बैठक में सोनिया गांधी ने संसदीय गतिरोध की समस्या को सुलझाने की बजाए और अधिक उलझाने के संकेत अवश्य दे दिए।  सोनिया गांधी ने गुस्सैल रूख अपनाकर ये तो साफ़ कर दिया कि संसद की कार्यवाही इतनी आसानी से नहीं चलने देगी।  उनके इसी रवैये ने लोकसभा स्पीकर को संसद के नियम 374 का इस्तेमाल करने पर मजबूर कर दिया।  इस नियम के तहत लोकसभा स्पीकर संसदीय कार्यवाही में रुकावट पैदा करने वालों को संसद से निलंबित कर सकते हैं।  इसी नियम के अनुसार ही स्पीकर सुमित्रा महाजन ने कांग्रेस के 25 सदस्यों को 5 दिन के लिए संसद से बाहर का रास्ता दिखा दिया।  लोकसभा स्पीकर ने इन सदस्यों को संसद में गतिरोध उत्पन्न करने के सन्दर्भ में पहले ही चेतावनी दी थी जिसे कांग्रेस के सदस्यों ने नजरअंदाज कर दिया।  अब संसद में सत्तापक्ष और विपक्ष में बातचीत के कोई आसार नजर नहीं आते हैं।  देश की जनता का दुर्भाग्य है कि उन्हें मानसून  सत्र में देश के हित में कुछ भी होता हुआ नजर नहीं आ रहा है।

लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन  के सख्त रूख अपनाने से विपक्ष और भी अधिक तिलमिला उठा है।  अब वो अन्य राजनीतिक दल भी सुमित्रा महाजन के इस रवैये का विरोध कर रहे हैं जो “इस्तीफा नहीं तो काम नहीं” के कांग्रेस के नारे के खिलाफ थे।  कांग्रेस सरकार को संसद की कार्यवाही को आगे बढ़ाने से ज्यादा दिलचस्पी आईपीएल के पूर्व चेयरमैन ललित मोदी से जुड़े केस में घिरी सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे तथा व्यापम घोटाले के कारण मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का इस्तीफा लेने में है।  कांग्रेस इन सब के इस्तीफे पर अड़ी  है।  इसलिए ही कांग्रेस ने इस नारे को जनम दिया है कि “इस्तीफा नहीं तो काम नहीं”।  स्पीकर के कड़े रूख को लेकर विपक्षी पार्टियों का भी संसद में एकमत नहीं है।  जहां वामदलों और जनता दल (यू) ने इसका समर्थन किया वहीँ तृणमूल कांग्रेस ने इसे संसदीय परम्परा के विरुद्ध बताया।  इसी विरोध के साथ ही तृणमूल कांग्रेस ने अगले 5 दिन तक संसद का बहिष्कार करने का निर्णय भी सुना डाला।  सोनिया गांधी ने कहा था कि “कल के हंगामेबाज आज बहस आर विचार-विमर्श के समर्थक बन गए हैं”।  लेकिन अब यही बात कांग्रेस के लिए बोली जाये तो कहा जा सकता है कि “कल के बहस के हिमायती आज हंगामेबाज़ बन गए हैं”।

यदि निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो सुमित्रा महाजन का यह कदम उचित है।  लोकसभा में दुर्व्यवहार सभी को शर्मिन्दा करता है. ऐसा होना ही नहीं चाहिए कि नौबत यहाँ तक आ जाये। कांग्रेस सांसदों का निलंबन नियमों के लिहाज से जायज है।  अब इसे स्थायी नियम का रूप ले लेना चाहिए।  चाहे कोई भी हो सत्तापक्ष या विपक्ष।  संसद का अपमान करने वालो तथा ससदीय कार्यवाही में खलल उत्पन्न करने वालों पर कार्यवाही होनी ही चाहिए। सवाल यह उठता है कि पिछले कुछ समय से संसद में जो संसदीय कार्यवाही का विरोध करने की परम्परा बन रही है, उसके रहते क्या देश के हित में कोई भी निर्णय लेना संभव होगा? जनता को तो नहीं लगता।  अब इसका हल तो सभी दलों को पुनर्विचार करके ही निकालना होगा।  उन्हें समझना होगा कि जनता ने उन्हें राष्ट्र हित में कार्य करने के लिए चुना है, ना कि अपने राजनीतिक स्वार्थ को पूरा करने के लिए।  देश की आम जनता निराश है लेकिन अभी भी उम्मीद भरी नजरों से संसद की तरफ देख रही है।  इसका सम्मान करना ही होगा.

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