अपने धर्म को भूल रहा है मीडिया

आज के समय में राजनीती और बांटना शायद एक सिक्के के दो पहलुओं की तरह एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। आज के दौर के हिसाब से देखा जाए तो राजनीती का छिपा हुआ अर्थ ही बांटना है या यूँ कह लीजिये की बांटने को ही आज के समय की राजनीती कहते हैं। यह मान लेना कतई गलत नहीं होगा कि राजनीती का तो काम ही बांटने का है और अगर वे बांटेंगे नहीं तो अपनी कुर्सियों को ज्यादा समय तक बचा के नहीं रख पाएंगे। देखा जाये तो हैदराबाद के ओवैसी से लेकर दिग्विजय सिंह, शशि थरूर सबको याकूब के मुदद्दे पर हंगामा मचाने के लिए क्षमादान दिया जा सकता है क्यूंकि वो सब तो अपने आज के राजनीती धर्म का पालन कर रहे थे। देश पर अपना शासन अथवा प्रभुत्व जमाने के लिए ऐसा करने की प्रेरणा शायद उन्होंने अंग्रेजों के प्रसिद्द नारे “फूट डालो और राज़ करो” से ली है। राजनीति का तो काम ही लोगों को बांटना है लेकिन मीडिया को कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है, जिसने देश के सामने सत्यता को प्रकट करने की शपथ ले रखी है। लगभग एक सप्ताह पहले मीडिया ने देश के लोगों को धर्म के नाम पर बांटने में खूब बड़ी भूमिका अदा की। अपने जान-जागरण के संकल्प को भूलकर मीडिया ने अपने चैनलों की टीआरपी बढ़ाने में अपना पूरा जोर लगा दिया। भले ही उससे देश के भीतर कैसा भी माहौल क्यों ना पैदा हो।

12 मार्च 1993 को खून से लथपथ वो मंजर कभी भुलाया नहीं जा सकता, जिसने ना जाने कितने ही घरों के चिराग भुजा दिए, कितनो को यतीम और बेऔलाद कर दिया। जिस मामले में याकूब मेमन को फांसी हुई वो हमारे लिए विवाद का विषय है। जिस मामले में इस आतंकवादी को फांसी की सज़ा हुई उस खौफनाक हादसे के दिन मुंबई शहर के सेंचुरी बाजार की ही घटना पर गौर कर ले तो आपकी आत्मा कांप जाएगी कि वहां याकूब मेमन और उसके साथियों ने इस बात की रैकी(जांच) की थी कि धमाका करने के लिए किस जगह पर बारूद भरा जाए ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग मारे जा सकें। याकूब ने बाजार के मैनहोल में विस्फोटक भरवाया था, जिसके ऊपर से स्कूल बस के गुजरते ही बम फटा था। सिर्फ इसी जगह पर मरने वालों में 100 से अधिक बच्चे, महिलाएं तथा कुछ बुजुर्ग भी थे। लेकिन मीडिया और राजनीति इस मामले पर भी आपस में बंटी हुई नज़र आई।

याकूब मेमन की फांसी की खबर को, हमारे देश का सम्मान कहे जाने वाले हमारे राष्ट्रपुरुष वैज्ञानिक डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की खबर से ज्यादा तवज्जो देकर टेलिसीजन मीडिया ने जिस प्रकार देशवासियों के भावनाओं का अपमान किया है, वो माफ़ी के काबिल नहीं है। देश की प्रिंट मीडिया ने तो सयम दिखाकर कैसे न कैसे अपनी साख बचा ली लेकिन टेलीविजन मीडिया ने तो बेशर्मी की सारी हदें ही पार कर दी। असदुद्दीन ओवैसी जो उस हत्यारे आतंकवादी को बचाने के लिए मुसलामानों को हिन्दुओं के खिलाफ भड़का रहा था, उसे तो ये चैनल वाले लाइव दिखाते रहे और देश के महान वैज्ञानिक जो देशवासियों को हमेशा के लिए अलविदा कह चले थे उनके लिए मीडिया के पास बिलकुल भी समय नहीं था? क्या  क्या मीडिया केवल सनसनी फैलाने को ही अपना सामजिक दायित्व समझती है? आतकवाद के खिलाफ लड़ना क्या सिर्फ सराकरों, सेना और देश के लोगों की ही जिम्मेदारी है ? क्या मीडिया की इसमें कोई भूमिका नहीं हो सकती? अगर हो सकती है तो मीडिया का दायित्व नहीं बनता था कि वो आतंकवादियों के पक्ष में भोंकने वाले लोगों को ना दिखाकर उन परिवारों के लोगों से बात करे जिन्होंने 1993 में अपना सब कुछ खो दिया था। क्या मीडिया का यह जानना फर्ज नहीं बनता था कि याकूब की फांसी ने पीड़ितों के जख्मों पर किस कद्र मरहम लगाने का काम किया है?

लेकिन देश का चौथा स्तम्भ कहे जाने वाली मीडिया के पास पीड़ितों के मन का हाल जानने का समय कहाँ था। उन्हें तो देश में सनसनी फैलाने का महत्वपूर्ण कार्य जो करना था। आखिर यह कैसी पत्रकारिता है जिसके संदेशों से यह ध्वनित हो रहा है कि हिन्दुस्तान के मुसलमान एक आतंकी की मौत पर दुखी हैं? क्या इससे दो धर्मों के लोगों में रिश्तेेे कमजोर नहीं होंगे? आतंकी के मुसलामानों से तुलना करना क्या हिन्दुस्तान के बाकी मुसलमानों के साथ अन्याय नहीं होगा? मेरी ऐसा मानना है कि हिन्दुस्तान का मुसलमान किसी हिन्दू से कम देशभक्त नहीं है। लेकिन ओवैसी जैसे लोगों को मुस्लिमों का प्रतिनिधी मानकर उसके विचारों को सारे मुसलामानों के राय मान लेना क्या मुसलामानों के साथ अन्याय नहीं होगा? लेकिन मीडिया ने वोट की राजनीती करने वाले ओवैसी की निराधार बयानबाजी को ज्यादा हवा देकर अपनी नासमझी का प्रमाण दिया है। आखिर क्यों मीडिया भारतीय मुसलामानों को अलग नजर से देखती है? क्या आतंकवादी गतिविधियों में केवल हिन्दू ही मारे जाते हैं मुसलमान नहीं?

दोनों कौमों की लड़ाई सामान ही है। दोनों के सुख-दुःख एक ही हैं। आतंकवाद का जितना प्रभाव हिन्दुओं पर पड़ता है उतना ही मुसलामानों या अन्य धर्म के लोगों पर भी पड़ता है। दोनों के सामने बेरोजगारी, गरीबी, महंगाई मुँह फाड़े खड़ी है। वे भी दंगों में मरते और मारे जाते हैं। बम उनके बच्चों को भी अनाथ बनाते हैं। तो फिर मीडिया को क्या जरूरत पडी है कि वो उनको अलग अलग नज़र से देखकर दोनों का बांटने का काम करे? देश की अदालतें जाति या धर्म देखकर फैसले करती हैं, यह कहना तो बिलकुल ही गलत है। फांसी दी जाए या न दी जाए इसके पहलुओं पर विचार करना बेहद आवश्यक है, किन्तु जब तक हमारे देश में यह सजा मौजूद है तब तक किसी की फांसी को साम्प्रदायिक रंग देना कहां की समझदारी है? दिग्विजय सिंह और शशि थरूर तब कहां थे जब कांग्रेस के कार्यकाल में फांसी हुई थी? इसलिए देश की एकता और अखंडता को ठेस पहुंचाने वाले की सज़ा के विरुद्ध खड़े होना, देश के सर्वोच्च न्यायालय तथा महामहीेम राष्ट्रपति के विवेक पर संदेह करना अपने आप में एक अपराध ही है।

डा. कलाम ने एक बार मीडिया विद्यार्थियों को शपथ दिलाते हुए कहा था, ‘‘मैं मीडिया के माध्यम से अपने देश के बारे में अच्छी खबरों को बढ़ावा दूंगा, चाहे वे कहीं से भी संबंधित हों। क्या मीडिया कलाम  साहब को दिए इस वचन को निभा रही है? देश की धर्मनिरपेक्षता का नारा “हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख-ईसाई आपस में सब भाई भाई”, सुनने में और पढ़ने में तो बहुत अच्छा लगता है किन्तु क्या सच में हम इस नारे का सम्मान कर पा रहे हैं? हम बंटे हुए लोग इस देश को कैसे एक रख पाएंगे? सभी धर्म के लोगों में दरार पैदा करने वाली राजनीति हो रही है और मीडिया भी इसे अपने चैनलों पर खूब उछाल रहा है। क्या ऐसा करना सही है? मीडिया अपने धर्म को भूल रही है। मीडिया को आखिर ये अधिकार किसने दिया कि वह ऐसी बयानबाजियों को दिखाए जिससे देश का माहौल बिगड़ सकता है। मीडिया को यह समझना होगा कि उसका काम बहुत ही जिम्मेदारी वाला काम है। मीडिया को आखिर यह कौन समझाएगा कि भारतीय हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों के नायक भारतरत्न कलाम हैं न कि कोई आतंकवादी. मीडिया आतंकवाद को खत्म करने में बहुत बड़ी भूमिका निभा सकता है. बस जरूरत है तो सत्यता, निष्पक्षता और ईमानदारी से काम करने की।

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