इलैक्ट्रॉनिक ट्रैफिक सिग्नल का जन्म

विश्व में लगातार तेज़ी से बढ़ रहे आधुनिकीकरण ने जहाँ लोगों की ज़िंदगी को आसान बना दिया है , वही इसने कुछ समस्यायों को भी जनम दिया है। जिसमें से एक है ट्रैफिक की समस्या। जहाँ भी जाओ गाड़ियों के चहल पहल नज़र आ ही जाती है। आज के समय में नाममात्र लोग ही होंगे जो कहीं आने जाने के लिए वाहन का प्रयोग ना करते हों। हर कोई अपना समय बचाने के लिए किसी ना किसी वाहन से सफर करता है। लेकिन इस नए युग की इस सुविधा ने ट्रैफिक की समस्या उत्पन्न कर दी है। इसी समस्या के चलते लोग घंटों तक जाम में फंसे रहते हैं। कई बार तो एम्बुलैंस भी ऐसे जाम में फंस जाती है जिससे किसी की जान तक चली जाती है। लेकिन एक ऐसी तकनीक जिसने इस ट्रैफिक की समस्या को पूरी तरह से समाप्त तो नहीं किया  लेकिन काफी हद तक सुधार अवश्य दिया। इस तकनीक का नाम है ” इलैक्ट्रोनिक ट्रैफिक सिग्नल प्रणाली“. जिसे हम स्थानीय भाषा में रेड लाइट ट्रैफिक सिग्नल भी बोल देते हैं। तो चलिए जानते हैं कि इस तकनीक कआ जन्म कहाँ हुआ और कहाँ इसे सबसे पहले प्रयोग किया गया था?

तस्वीर में एक व्यक्ति ट्रैफिक सिग्नल लगाता हुआ
तस्वीर में एक व्यक्ति ट्रैफिक सिग्नल लगाता हुआ

सड़कों पर यातायात की समस्या को नियंत्रित करने का श्रेय यूनाइटिड स्टेट्स अमेरिका को जाता है। अमेरिका पहला ऐसा देश बना जहाँ पर सबसे पहले यातायात की बढ़ती तादात को आँका गया। हालांकि इस तकनीक के प्रयोग से पहले भी अमेरिका की सड़कों पर ट्रैफिक पुलिस अधिकारी यातायात को संभालते थे लेकिन अब ये उनके लिए नियत्रित कर पाना भी मुश्किल हो रहा था। इस तकनीक का मुख्य उद्देश्य ना केवल ट्रैफिक को नियंत्रित करना था बल्कि सड़क हादसों पर लगाम कसना भी था। इसका प्रयोग सबसे पहले चौराहों पर ही किया गया किन्तु आजकल कई बड़े महानगरों में इसे चौराहों के अलावा अन्य जगहों पर भी देखा जाता है, जहाँ पर लोगों की चहलकदमी अधिक है।

विश्व का पहला इलैक्ट्रोनिक ट्रैफिक सिग्नल 5 अगस्त, 1914  को अमेरिका के ओहायो राज्य के क्लीवलैंड शहर की “105  वी  एंड यूक्लिड” सड़क पर लगाया गया था। इसे “जेम्स हॉग” ने डिजाइन किया था। कुछ अन्य शहरों में सफलतापूर्वक प्रयोग के बाद 1918 में हॉग ने इसे पेटेंट करवा लिया। हालांकि अमेरिका में डिजाइन की गयी इस तकनीक से पहले भी ट्रैफिक सिग्नल लगाए गए थे। इसे 9 दिसंबर 1868 को यूनाइटिड किंगडम के लंदन में ब्रिटिश संसद के पास लगाया गया था। किन्तु यह प्रयोग सफल नहीं हुआ। ये गैस आधारित ट्रैफिक सिग्नल थे जिसमें अचानक विस्फोट हो जाता था। अमेरिकी इलैक्ट्रॉनिक ट्रैफिक सिग्नल प्रणाली  ने ट्रैफिक के नियंत्रण को ना केवल एक दिशा प्रदान की बल्कि उन पुलिस कर्मियों को भी राहत दी जो ट्रैफिक नियंत्रित करने के लिए कई बार अपनी जान तक जोखिम में डाल देते थे। जिन शहरों में इसका प्रयोग किया गया वहां जन-चेतना के लिए कई प्रोग्राम किये गए जिससे कि लोगों को इस इलैक्ट्रोनिक ट्रैफिक प्रणाली के बारे में जागरूक किया जा सके। इसमें लाल व् हरे रंग की लाईट का प्रयोग किया गया था। लोगों को इन लाइटों को लगाने का अर्थ समझाया गया। धीरे-धीरे ये तकनीत विश्व भर में प्रचलित हो गयी। आज ज्यादातार देशों में इस प्रणाली को प्रयोग किया जा रहा है.।

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