स्वतंत्रता दिवस पर विशेष- आज़ादी के मायने

तमाम तरह की सजावट से लैस दिल्ली का लाल किला जहाँ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तिरंगा फहराकर देश को सम्बोधित किया। लाल किले के प्राचीर से यह उनका दूसरा सम्बोधन था। बच्चों में अपने प्रधानमंत्री से बात करने का उत्साह लाल किले पर आज देखा जा सकता था। मोदी जी से मिलने की खुशी से यह साफ़ जाहिर हो रहा था कि मानो बच्चों को प्रधानमंत्री से न जाने कितनी उम्मीदें हैं। और ऐसा होना भी चाहिए। देश के भविष्य को अपने देश के प्रधानमंत्री से उम्मीदें होनी जायज है। किन्तु जिस उज्जवल भारत के सपने ये छोटे-छोटे बच्चे देख रहे हैं उसे पूरा करने के लिए मौजूदा सरकार तत्पर भी है या फिर उम्मीदों के सपने देखकर ये बच्चे स्वयं के साथ ही धोखा कर रहे हैं। आज लाल किले पर सब कुछ वैसा ही हुआ जैसा एक वर्ष पूर्व हुआ था। ऐसा लग रहा था मानो सब कुछ एक कागज़ पर लिखा गया हो और उसे क्रमवार दोहराया जा रहा हो। प्रधानमंत्री का तिरंगा फहराना, उमीदों से भरा भाषण, बच्चों से मिलकर उनमें उत्साह भरना आदि सब पहले जैसा ही था।

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आजादी के दिन को पूरे देश में बहुत धूमधाम से मनाया जा रहा है। खासकर सरकार 15 अगस्त के इस दिन के लिए विशेष तैयारियों में जुटी नज़र आयी। स्कूलों, सरकारी संस्थानों, महाविद्यालयों, विश्विद्यालयों आदि में हर जगह तिरंगा लहराया नज़र आया। कहीं देश में “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” अभियान के अंतर्गत बेटियों से ही तिरंगा फहराया गया। क्या तिरंगे की शान में चार चाँद लगाने के लिए केवल एक ही दिन है, 15 अगस्त का? यदि सरकारें आजादी न मनाये तो क्या देश में इस दिन का इतना उत्साह देखने मिल सकता है? सच माने तो ऐसा नहीं होगा। देश इस समय इतना गरीबी, सुरक्षा, महंगाई से परेशान नहीं है जितना इस देश की सरकारों से है। देश के लोगों के पैसों पर भारी सुरक्षा के साथ बड़ी बड़ी गाड़ियों में घूमने वाले नेताओं की क्या यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि वो अपने निजी झगड़ों से हटकर देश के हित के लिए एक साथ आगे आएं। क्या पिछले दिनों मानसून सत्र में संसद में मचे हंगामे से देश वाकिफ नहीं है? बेवजह अपनी लड़ाई और जिद को जनता के हित में सही बताने का अधिकार है उन्हें? संसद में काम में अवरोध उत्पन्न करके जिस पैसे की बर्बादी की जा रही है वो उनकी जेब से खर्च हो रहे हैं? लेकिन इन सरकारों ने देश का जो हाल इस समय बना रखा है, उसके हल के लिए कोई प्रयास होते हीं दिखते। ऐसे में देश की जनता क्या करे? एक सरकार ने उम्मीदें तोड़ी तो दूसरी सरकार को मौका दिया, लेकिन उनके सिपेसालार ने तो साल भर में विदेश यात्राओं की ऐसी झड़ी लगाई कि देश के लोगों के लिए प्रधानमंत्री के दर्शन करने ही दुर्लभ हो गए।

कहने को हम आजाद हैं लेकिन यह आज़ादी केवल कागज़ों में ही सीमित नहीं रह गयी है? सोशियल मीडिया, अखबारों में, टीवी चैनलों पर स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें जोरों शोरो से दी जा रही हैं। लेकिन लगता तो ऐसा है कि आजादी केवल देश के राजनेताओं तक ही सीमित रह गयी है। कुछ भी बोलने की आज़ादी। एक दूसरे पर कीचड उछालने की आज़ादी। संसद में हंगामा करने की आज़ादी। बाकी सब तो आज भी गुलाम ही हैं। गरीब महंगाई का गुलाम है तो किसान कर्ज की ज़ंजीरों तले दबा है। कहीं देश प्रकृति का कहर झेल रहा है तो देश की सीमा पर खड़े जवान दिन रात गोलाबारी का सामना करके शहीद हो रहे हैं। ऐसे में आज़ादी के मायने समझना बहुत मुश्किल हो गया है। सरकारें तो देश की आज़ादी का उत्सव मना रही हैं लेकिन देश की सीमा पर गोलाबारी का सामना करने वाले जवानों को शायद आज की तारीख भी याद ना हो। उन्हें तो केवल अपनी भारत माता की रक्षा करना और उसके लिए मर मिटना ही याद है।

मेरे लिए तो देश की आजादी के इस दिन के कोई मायने रह ही नहीं जाते, जब देश के जवान इस दिन पर मिठाइयां तक नहीं बाँट पाते। जिन पर देश की सुरक्षा का जिम्मा है ताकि देश के लोग आज़ादी को खुलकर जी सकें, यदि वो ही उदास हैं तो क्या मायने निकलते हैं इस आज़ादी के? क्या उन देश वासियों को इस आज़ादी के सुख का मजा लेने का कोई अधिकार नहीं है जिनके परिवार का कोई न कोई सदस्य देश की सीमा पर तैनात है?  इस सबके बावजूद देश की सरकार कोई सख्त रूख अपनाने की बजाये दुश्मन देश की तरफ बातचीत का हाथ बढ़ा देती है जिसे वह हर बार ठुकरा देते हैं। देश में लगातार हमले हो रहे हैं। देश की शांती को भंग करने का निरंतर प्रयास जारी है। देश में हर तरफ चिंताजनक माहौल है और बात करते हैं आज़ादी  की। आखिर क्यों सबकुछ लाचार सा प्रतीत होता है? आज भी आज़ादी के मायने बिलकुल भी नहीं बदले हैं जिनसे हमारा देश आज आजादी के 68 साल बाद गुज़र रहा है। बल्कि अधिक खतरनाक हो चले हैं। ऐसा लगता है मानो पूरी आजादी सिमट कर समस्याओं के कब्जे में आ गई हों और छटपटाती हुई अपनी प्राण रक्षा के लिए पुकारती हो।

क्या कोई स्पष्ट रूप से बता सकता है कि आखिर हम आज़ाद हैं क्यों? आखिर होती क्या है ये आज़ादी? इसे हम त्यौहार की तरह क्यों मनाएं? क्या राजनेताओं के सिवा कोई और भी जानता है इसका अर्थ? लाल किले के प्राचीर से हुई लुभावनी घोषणाएं जनता के लिए इतनी मायने नहीं रखती जितनी सत्ताधारियों के लिए रखती है। सत्ता आपके पास है। बहुमत आपके पास है। जनता आपकी है और आपको टकटकी लगाए देख रही है। सबकुछ तो है फिर कौनसी वजह है कि इन डेढ़ वर्षो में जमीनी स्तर पर नतीजे  में सिर्फ बाबा जी का ठुल्लु ही हाथ लगा है। सीमापार बैठे लोग रोज आपको धमकिया दे रहे हैं। एक शांती का दुश्मन देश आपकी छाती पर मूंग दल रहा है।आपकी भारत माता के शीश कश्मीर को अपने पंजे में लेकर नोचने खरोंचने का प्रयत्न करता है। फिर क्या वजहें हैं कि अलगाववादियों की ताकत आपकी ताकत से अधिक जान पड़ रही है। वो भी तब जब आप दिल्ली में बैठे ही इस इरादे से थे कि आप कश्मीर को अपना हिस्सा और आतंकवाद को ख़त्म कर देंगे. तब आखिर क्या कारण है कि आतंकवाद के मामले पर आप अपना पक्ष मजबूती से रख ही नहीं पा रहे?

फिर भी देशवासियों के पास फिलहाल आपसे उम्मीदें लगाए रखने की जगह कोई विकल्प नहीं है। आपको समय दिया है तो उस समय का सदुपयोग करने की जरूरत को समझिए। क्योंकि बदलाव और अच्छे दिन की आस नई सरकार पर विश्वास के कारण है। इस विश्वास को न सिर्फ बनाए रखने बल्कि उसे साकार करने की जरूरत है। आज़ादी केवल कागज़ों की रौनक ना बढाए बल्कि देशवासियों के दिल में उमंग और उत्साह भर दे। आज़ादी के इस दिन यही कामना है कि लालकिले से जो घोषणाएं की गयी है वो सत्यता में परिवर्र्तित हो जाएं. और खुशी और आज़ादी का असली माहौल देश में दिखाई दे।

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