गुजरात सरकार की कमियों की कहानी है पटेल आरक्षण आंदोलन

आरक्षण, एक ऐसा मुद्दा जिसने देश को जातिवाद के रंग में रंगने का काम बखूबी किया है। आरक्षण जाति के तौर पर सरकार से मिलने वाला एक ऐसा प्रसाद है जिसने देश के लोगों को काम करने की बजाये इस ओर ज्यादा प्रोत्साहित किया है कि बिना मेहनत किये या कम मेहनत किये कुछ हासिल करना है तो आरक्षण को हक़ मानकर उसके लिए मांग शुरू कर दो। जाति को आधार बनाकर राजनीति करने वालों ने भी आरक्षण को हथियार बनाकर लोगों को बांटने का काम बखूबी किया है। पिछले कुछ समय में आरक्षण मांगने वाली विभिन्न जातियों के लोगों ने सरकार को झुकाने के लिए आरक्षण का अलाप कई बार गाया है, फिर भले ही वो लोग आर्थिक तौर पर समृद्ध हो या कमज़ोर। हरियाणा के जाट समुदाय का आरक्षण की मांग तथा गुजरात का पटेल आंदोलन इसके सटीक उदाहरण हैं।  ये दोनों समुदाय आर्थिक रूप से समृद्ध हैं किन्तु आरक्षण की मांग पर अड़े हैं।

395553-hardikpatelअहमदाबाद में उमड़ा पटेल समुदाय के लोगों का विशाल हजूम इस बात की और इशारा करता है कि आरक्षण की मांग को लेकर पटेल अब एकजुट हो गए हैं। पटेल समुदाय गुजरात में आर्थिक रूप से काफी समृद्ध लोगों का समुदाय है। तो आखिरकार ऐसा क्या हुआ कि अचानक से यह समुदाय आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन पर उत्तर आया? किसने इतने बड़े जनसैलाब की नींव रखी? गुजरात में इन दिनों आरक्षण की आग भड़की हुई है जिसका नेतृत्व कर रहा है एक 25 साल का लड़का। इस 25 साल के लड़के ने पूरे गुजरात की राजनीति को हिलाकर रख दिया है। इस नौजवान ने गुजरात में अबतक 80 से ज्यादा रैलियां की हैं। गुजरात में तूफ़ान बनकर आए इस शख्स का नाम है “हार्दिक पटेल। 2 महीने पहले तक परिवार, दोस्तों और पड़ोसियों के अलावा शायद ही कोई हार्दिक को जानता हो। 2 महीने के इस वक्त में साधारण कद-काठी के इस युवा ने पाटीदार आरक्षण आंदोलन के झंडे तले जो जनसैलाब इकट्ठा किया है, वह अभूतपूर्व है।

आरक्षण को लेकर हार्दिक ने इस आंदोलन कि शुरुआत तब की जब वो खुद इसका शिकार बना। उसके पड़ोसी लड़के को कम नंबर के बावजूद सरकारी नौकरी मिल गई और वो मुंह देखता रहा। हार्दिक ने जब युवाओं की बात को मंच पर उठाना शुरू किया तो उसे मंझे हुए नेताओं ने भी तवज्जो नहीं दी। तब हार्दिक ने बीते जुलाई में “पाटीदार अनामत आंदोलन” की नींव डाली। उन्होंने पटेल समुदाय के युवाओं के साथ आरक्षण के नाम पर हो रहे भेदभाव के खिलाफ बिगुल बजाते हुए सरकार को चेतावनी दे दी कि यदि पटेल जाती को अन्य पिछड़ा वर्ग(ओबीसी) की श्रेणी में नहीं लाया गया तो 2017 के विधानसभा चुनाव में “कमल” नहीं खिलने देंगे। “पाटीदार अनामत आंदोलन समिति” के नेता हार्दिक पटेल की इस चेतावनी ने से भाजपा के माथे पर पसीने की नदी बहा दी है। पटेल समुदाय का भाजपा की जीत में हमेशा से ही विशेष योगदान रहा है। पटेल समुदाय समृद्ध, दबंग तथा संख्यात्मक रूप से प्रभावशाली है।

प्रशन यह उठता है कि गुजरात में आरक्षण की मांग करने वाला यह जनसमूह अचानक से कहाँ से निकल आया? अहमदाबाद में 10 लाख से भी ज्यादा पाटीदार क्या रेगिस्तान में उड़ने वाले तूफ़ान की तरह आ गए थे? 1985 में ओबीसी आरक्षण का सबसे अधिक विरोध करने वाले ही आखिर अचानक से आरक्षण के मांग क्यों करने लगे? यहाँ अचानक का मतलब 50 दिन के बहुत ही कम समय से है। बीते 6 जुलाई से पहले तो उजरात में आरक्षण के विषय में चर्चा तक नहीं थी, ना इतना बड़ा जनसैलाब एकजुट था, ना ही आरक्षण को लेकर किसी प्रकार का गुस्सा।

छः जुलाई को मेहसाना में पटेल समुदाय के लोगों की एक रैली हुई, जिसमें 5000 लोग इकट्ठे हुए। किन्तु इस रैली को ना तो नेताओं ने तवज्जो दी, ना पुलिस ने और ना ही मीडिया ने। 2 दिन बाद मेहसाना के पास ही विषनगर में दूसरी रैली हुई। जुटे तो यहाँ भी तकरीबन उतने ही लोग लेकिन मीडिया में यह मुद्दा उस समय सामने आया जब विषनगर के पाटीदारों ने अपने गुसैल स्वाभाव का परिचय देते हुए वहां के विधायक ऋषिकेश पटेल के दफ्तर पर हमला कर दिया। तब जाकर मीडिया का ध्यान इस और गया। अखबारों में इसकी थोड़ी बहुत चर्चा हुई। आरक्षण आंदोलन भी सबकी नज़रों में अाया और हार्दिक पटेल भी।

विषनगर की इस रैली के बाद तो जैसे तूफ़ान ही आ गया। जिला व तहसील स्तर  पर रोज छोटी छोटी रैलियां करके पाटीदारों को इकट्ठा करने का प्रयत्न किया गया। पटेलों की लगातार रैलियां होने लगीं और लगातार घोषणाएं भी सामने आने लगीं। जिसके बाद इन्होने सूरत में बड़ी रैली करनी की घोषणा की। जिसका मुख्य उद्देश्य सूरत व उसके आसपास के पाटीदारों का समर्थन हासिल करना था। 7 लाख के करीब पाटीदार सूरत में इकट्ठा हुए। ये सब रैलियां शांतिपूर्ण तरीके से हुयी, इसलिए इन रैलियों में जुटने वाली भीड़ ने पाटीदारों के हौसले को और बड़े पंख लगा दिए। इतनी संख्या में पाटीदारों को खुद के विरुद्ध खड़ा देखकर सरकार के पसीने भी छूटने लगे। जिस दिन सूरत रैली हुई, उसी दिन पटेल समुदाय के नेताओं को सरकार ने बातचीत का न्यौता दिया। किन्तु आनंदीबेन पटेल सरकार के लिए उनकी आरक्षण की मांग को स्वीकार कर लेना आसान नहीं है। इसलिए गुजरात सरकार ने भी कह दिया कि “अनामत तो नहींज मिले” मतलब “आरक्षण तो नहीं मिलेगा”।

सरकार के  इस इनकार से पटेलों ने अपने स्वर में आक्रोश भर लिया और उन्होंने उसके बाद यह घोषणा कर दी कि 25 अगस्त को अहमदाबाद में होने वाली महारैली से पहले सरकार से कोई बातचीत नहीं होगी। इस रैली में पहले से भी अधिक भीड़ जुटी। 10 लाख से भी ज्यादा पाटीदार इस रैली में शामिल हुए। जहाँ सब रैलियां शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुयी थी वहीँ इस रैली ने हिंसक रूप ले लिया। जिसमें 8 लोगों की जान भी चली गयी।

लेकिन क्या सरकार कि गलतियों को अनदेखा किया जा सकता है? या यूं कहा जा सकता है कि सरकार की कमियों की कहानी ही है पटेल आरक्षण आंदोलन? क्या गुजरात जातिवाद राजनीति में प्रवेश कर रहा है? लेकिन इसका जिम्मेदार कौन हैं? आरक्षण की आग को हवा देने में भाजपा का भी पूरा योगदान है। सत्ता में आने के बाद नरेन्द्र मोदी सरकार ने जाट आरक्षण तथा महाराष्ट्र में फड़नवीस सरकार ने  मराठा आरक्षण पर रूख तय करते हुए पूर्व कांग्रेस सरकारों के मजबूरी में उठाए गए क़दमों का कोर्ट में बचाव किया, जिस पर कोर्ट ने उन्हें कड़ी फटकार लगायी। लेकिन केंद्र अब तक इन समृद्ध तथा दबंग समुदायों को आरक्षण देने का समर्थन कर रहा है। तो फिर कैसे पटेल, ब्राह्मण तथा अन्य जातियां आरक्षण की मांग पर पीछे रह सकती हैं?

पटेलों के इतना बड़ा आंदोलन सरकार की कमियों की पोल खोलने के लिए काफी है। सरकार के पास बातचीत का पर्याप्त समय था। सरकार चाहती तो रणनीति भी बना सकती थी और पटेलों से बातचीत का दौर भी जारी रख सकती थी। लेकिन किसी ने कुछ न सोचा और ना किया, और दो टूक जवाब देकर इतने बड़े आंदोलन को जन्म दे दिया। सरकार के पास इस समस्या से निपटने की अपनी कोई तैयारी नहीं थी। सरकार केवल पाटीदारों की भीड़ से डरकर बौखला रही थी। करना क्या है, यह बिलकुल भी स्पष्ट नहीं था। सरकार की बोखलाहट पर पुलिस ने भी मुहर लगा दी। सरकार के बाद पुलिस ने भी अहमदाबाद रैली को हिंसक रूप लेने में अपना योगदान दे दिया।

सभी रैलियों की तरह अहमदाबाद रैली भी शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुई। सब लोग अपने घर को लौट रहे थे। जीएमडी मैदान पर जहाँ हार्दिक पटेल धरना दे रहे थे वहां केवल 4000 पाटीदार ही बचे थे, लेकिन पुलिस ने अपनी बौखलाहट का परिचय देते हुए वहां लाठीचार्ज कर दिया। यह खबर आग की तरह फैल गयी और पटेल समुदाय के जो लोग अभी घर भी नहीं पहुंचे थे, उन्होंने वही तोड़फोड़ शुरू कर दी। जहाँ से गुजरात में हिंसा ने जन्म ले लिया। रैली से पहले सरकार ने रैली में पहुँच रहे लोगों के टोल टैक्स ना देने तथा रैली के पुख्ता इंतज़ाम, सुरक्षा जैसी कई मांगों को मान लिया था तो फिर सरकार को इतनी जल्दी हार्दिक की धरपकड़ करने की क्या जरूरत आन पडी थी। देर रात तक गुज़रात की मुख्यमंत्री भी इस पर अपनी सफाई देती रही कि यह निर्णय पुलिस का है लेकिन तब किसको सुननी थी, हिंसा तो जन्म ले चुकी थी।

सरकार को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना होगा। उन्हें इस समस्या के निपटारे की रणनीति सुनिश्चित करनी होगी। उन्हें पटेल समुदाय के लोगों से लगातार बातचीत करनी होगी। आरक्षण मामले में सिद्दांतनिष्ठ और समरूप रवैया ना अपनाने के कारण ही गुजरात सरकार इस नयी राजनीतिक मुसीबत में फसी है। सरकार को यह समझना होगा कि पटेलों को आरक्षण देने से अन्य समाज भी इसके लिए सक्रिय होंगे। सरकार को अपनी गलतियों से सबक लेते हुए इस विषय पर आत्म-मंथन की आवश्यकता है। अब देखना यह है कि भाजपा और अन्य पार्टियां इससे कोई सबक लेंगी? गुजरात सरकार को पुलिस के रूख पर भी कार्यवाही सुनिश्चित करनी होगी ताकि पाटीदारों से बातचीत के दौरान पुलिस के इस रवैये पर अपना पक्ष रख सके।

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