जल है तो अगला पल है – विश्व जल दिवस पर विशेष

आज बड़ा अच्छा दिन है. आज विश्व जल दिवस है. हालांकि मैं पानी को सहेजने के लिए किसी एक दिन या अवसर का समर्थक नहीं. यह तो हमारे जीवन जीने के स्वाभाव में होना चाहिए कि पानी के प्रति अपनापन दिखाएं. लेकिन फिर भी आज के दिन के इस अवसर पर एक अच्छी खबर देख रहा हूँ कि राजधानी दिल्ली में लोग पानी को लेकर काफी संवेदनशील दीखते हैं. थोड़ी समझदारी खुद दिखा रहे हैं और थोड़ा कमाल कानून का भी है जिसने पानी व्यर्थ गंवाने पर जुर्माना करने तोहफा दिल्ली वालों को दे रखा है. या यूं कह लीजिये कि 2 रूपए खर्च कर जब छोटा सा गिलास पीने को मिलता है तो पानी की कीमत समझ आ ही जाती है. मैं भी पहले से काफी समझदार हुआ हूँ लेकिन सिर्फ पानी के प्रति. व्यर्थ नहीं गंवाता हूँ.

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एक तरीका पानी बचाने का शेयर करता हूँ. थोड़ा अटपटा लगेगा लेकिन कामगार है. मेरे लिए तो है. आपको शायद ध्यान हो बच्चों के लिए नहाने के रबर के छोटे बड़े टब आते हैं मैंने भी अपनी भांजी के लिए खरीद था 230 का. साइज़ भी ठीक-थक सा है. मैं आराम से बैठ लेता हूँ उसमे. उसमे बैठ कर नहाता हूँ. उसमे पानी इकठ्ठा हो जाता है उसको मैं एक अलग राखी हुई बाल्टी में भर लेता हूँ और वाशरूम में प्रयोग कर लेता हूँ. क्योंकि दिल्ली में पानी समय पर ही अत है जिसके पैसे भी लगते हैं यानि कि जितना प्रयोग करो उस हिसाब से बिल. तो मैं ये तरीका रेगुलर प्रयोग में ला रहा हूँ. पहले जब दिमाग में आया था तब बड़ा बोरियत वाला काम लगता था लेकिन आजकल दिनचर्या का काम है. कभी कभी तो नहाने को दूर से प्रणाम कर के अधिक पानी बचा पता हूँ. लेकिन अच्छा लगता है कि पानी व्यर्थ नहीं गंवा रहा. आप भी अपना के देखिये. या कोई और तरीका ढूंढिए और हमसे भी शेयर कीजिये. यकीन मानिये उस बच्चों वाले टब पर लगाए 230 रूपए बड़े अच्छे से वसूल हुए हैं पानी बचाकर. भांजी को उससे बड़ा और अच्छा टब ले कर देने की सोचा है.

आप भी अगर जल संरक्षण का कोई अनोखा तरीका जानते हों तो शेयर जरूर करें. शायद वो मुझे मेरे इस तरीके से भी आसान लगे. लेख अच्छा लगे तो शेयर कीजियेगा. धन्यवाद ! जल ही जीवन है. इसे जरूरत के हिसाब से ही इस्तेमाल करें.

गोविन्द सलोता

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पुरुषवादी सोच ! सही या गलत? – महिला दिवस पर विशेष

महिला दिवस 8 मार्च का दिन, आज उन लोगों की फेसबुक वॉल पर भी महिलाओं के सम्मान में तस्वीरे, सम्मानजनक सन्देश प्रकाशित देखे जिनके मुख से चंद लाइने भी माँ-बहन की गाली के बिना निकलती नहीं देखि मैंने कभी. अच्छा लगा कि चाहे एक दिन ही सही ये लोग अपनी जिह्वा पर नियंत्रण तो रख पाते हैं. लेकिन फिर समझने का प्रयत्न भी करता हूँ कि ऐसे सम्मान का क्या लाभ जो साल में एक दो दिन केवल दिखावे के लिए किया जाए. लेकिन ये नारीवाद बनाम पुरुषवाद का पुराना बोया हुआ कीड़ा हमारे दिमाग से इतनी जल्दी भला कैसे निकल सकता है.. ? नारीवाद और महिला सशक्तिकरण दरअसल दो ऐसे शब्द हैं जिन्हें प्रोत्साहन तो अवश्य मिलता है किन्तु स्थान नहीं,, न दिल में ना समाज में.. नारीवाद और महिला सशक्तिकरण ना तो पुरुषों के खिलाफ कोई लड़ाई है और ना ही पुरुषों को कमजोर करने की प्रक्रिया. सच माने तो पुरुषों के खिलाफ तो कोई लड़ाई है ही नहीं और हो भी क्यों? आखिर उनके बिना भी तो सृष्टी की कल्पना व्यर्थ है.

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अपने इस लेख से मैं पुरुषों से किसी भी प्रकार का विरोध जाहिर नहीं कर रहा हूँ, और पुरुष होने के नाते मुझे ऐसा करना शोभा भी नहीं देता लेकिन हाँ मैं उस पुरुषवादी विचारधारा के हरगिज विरोध में हूँ जो पुरुष को प्रधान बताती है और महिलाओं के लिए कुछ कार्यों का निर्धारण करती है कि उन्हें ये काम नहीं करने चाहिए. विरोध उस बड़ी आबादी का है जो पुरुषवादी सोच से ग्रसित है. और जरूरी नहीं ये सोच एक पुरुष ही रखता हो. ये सोच एक माँ की हो सकती है जो अपनी बेटी को कम बोलने, धीरे हँसने, बाहर ना खेलने और नजरें झुका कर चलने की सलाह छोटी उम्र से देना शुरू कर देती है. ये सोच एक पिता की हो सकती है जो अपनी बेटी को साइकिल चलाने, स्कूल जाने, स्कूटी चलाने, और सिनेमा जाने से रोकती है. ये सोच उस भाई की हो सकती है जिसे अपनी बहन के कहीं घूमने जाने पर आपत्ति है. ये सोच उस समाज की हो सकती है जो किसी बेटी के माता-पिता पर उसकी शादी जल्दी कर देने का निरंतर दबाब बनाते हैं ताकि कहीं वो कुछ बनकर ना दिखा दे. ये सोच उस लड़के की भी हो सकती है जो अपनी गर्लफ्रेंड के चरित्र पर सवाल केवल इसलिए उठा देता है क्योंकि वह और लड़कों से बात या दोस्ती कर लेती है. ये सोच उस पति की भी हो सकती है जो बिना मर्जी के अपनी पत्नी को शारीरिक संबंध बनाने को मजबूर करता है सिर्फ इसलिए क्योंकि वो उसे ब्याह के लाया है? ये सोच उस पंचायती ढाँचे की भी हो सकती है जिसे लड़कियों के जीन्स पहनने, बैकलेस कपडे पहनने, मोबाइल रखने पर आपत्ति है या फिर उन धर्म के ठेकेदारों की जिनको धार्मिक स्थलों पर उस नारी के प्रवेश से आपत्ति है जिससे सृष्टि का निर्माण हुआ है.

समस्या महिला नहीं है वह तो अपनी लग्न और मेहनत से समाज को सुन्दर बनाना चाहती हैं. समस्या की जड़ तो केवल हमारी पुरुषवादी सोच है जिसे बदलने की बहुत अधिक आवश्यकता है, भरोसा जताने की आवश्यकता है, विश्वास कीजिये नतीजे हमेशा अच्छे आये हैं. जरूरत महिलाओं के नाम पर सोशिअल मीडिया पर एक दिन की क्रान्ति दिखाने की नहीं है जरूरत है तो उन्हें मन से सम्मान देने की है. उनके साथ खड़े रहकर उन्हें जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने की है. जरूरत उन्हें बराबर मानने की है. उन्हें अपनी जिंदगी को जीने की आज़ादी देने की है. ऐसा करके देखिये जनाब आपकी बेटी, आपकी बहन, आपकी मित्र एक और ” मदर टेरेसा “, ” इंदिरा गांधी “, ” प्रतिभा देवी सिंह पाटिल “, ” किरण बेदी “, ” सुष्मिता सेन “, ” सानिया मिर्ज़ा ” बनकर आपको पूरे विश्व के सामने सम्मानित करने के लिए तैयार बैठी है. बस उसके कदम रोकने की बजाये कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित करें. लेख अच्छा लगे तो शेयर अवश्य कीजियेगा. धन्यवाद !

गोविन्द सलोता

हिन्दी दिवस पर विशेष – हिंदी में अंग्रेजी भाषा के शब्दों का प्रयोग

सारा साल चाहे हिन्दी की चिन्दी होती रहे लेकिन साल में कम से कम एक दिन के लिए तो उसकी पूछ हो ही जाती है। 14 सितम्बर के दिन दिखावे के लिए ही सही हम हिन्दी को रानी बना देते हैं। हिन्दी दिवस मनाया जाता है। कई कार्यालयों व विश्वविद्यालयों में हिन्दी से सम्बन्धित कार्यक्रम आयोजित किए जाते है। वहां बड़े-बड़े शासकीय अधिकारी अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी में भाषण दिया करते हैं क्योंकि  भारत सरकार ने आखिर हिन्दी को राजभाषा का दर्जा जो दिया है।

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अब अगर बात करें हिन्दी में शब्दों के प्रयोग की तो यह अंग्रेजी और हिन्दी के बीच का ऐसा खेल है जिसमें हिन्दी हारती ही जा रही है। इस बात में कोई शक नहीं है कि हिन्दी विश्व की तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। लेकिन बढ़ते हुए बाजारीकरण के कारण आज हर कोई केवल हिन्दी या केवल अंग्रेजी न सीखकर हिंगलिश बात करता है।  इंग्लिश में हिन्दी का केवल एक अक्षर ही आया और शेष ढाई अक्षर ‘ग्लिश’ अंग्रेजी भाषा के आते हैं  तो कहां रहेगा हिन्दी का प्रभुत्व। भारत सरकार ने हिन्दी को राजभाषा द्योषित किया हुआ है। न राज रहे न राजा, रह गई तो सिर्फ राजभाषा। भारत एक राष्ट्र है न की राज । अब राज ही नहीं  है तो यह बात समझ से परे है।

संविधान सभा ने 14 सिंतम्बर 1949 को हिन्दी को राजभाषा बनाने का फैंसला कैसे लिया ? इस प्रकार से तो राष्ट्रपिता के स्थान पर राजपिता होना चाहिए। भारत के पास अपना राष्ट्रीय ध्वज है, राष्ट्रीय गान है, राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह है। नहीं है तो बस राष्ट्रभाषा। आखिर क्यों हो एक राष्ट्रभाषा? भारत में अनेक भाषाऐं और बोलियां मौजूद हैं । संविधान के अनुछेद 344-1 और 351 के अनुसार उनमें से कुछ तो मुख्य रूप से बोली भी जाती है। अंग्रेजी , आसामी , बंगाली, डोगरी, गुजराती, हिन्दी, कन्नड, कश्मीरी, कोंकणा, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, सिंधी, तमिल, तेलुगू और उर्दू मुख्य रूप से बोली जाने वाली बोलियाँ है। अब भारत शासन हिन्दी को अगर राष्ट्रभाषा घोषित कर देता तो शेष भाषाओं  को भी दोहरा दर्जा देना पड़ता, तो निश्चय किया गया कि भारत में राष्ट्रभाषा न होकर राजभाषा होनी चाहिए। इस प्रकार से सभी सन्तुष्ट रहेंगे।

भारत में अधिकृत रूप से कोई भी भाषा राष्ट्रभाषा नहीं है किन्तु देखा जाए तो आज भी परोक्ष रूप से अंग्रेजी ही इस राष्ट्र की राष्ट्रभाषा है। शासकीय नियम के अनुसार हिन्दीभाषी क्षेत्र के कार्यालयों के नामपटल द्विभाषीय अर्थात हिन्दी और अंग्रजी दोनों में होने चाहिए। अर्थात अंग्रेजी  का होना तो आवश्यक है चाहें क्षेत्र हिन्दीभाषी हो या नहीं। तो हुई  न परोक्ष रूप से भारत की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी । इस संकल्प को कितना पूरा किया जा रहा है जो संविधान में लिया गया है। यह तो इसी बात से पता चल जाता है कि हमारे बच्चे आज हमसे पूछते हैं कि चौसठ का मतलब सिक्स्टी फार ही होता है ना ? उन्हें रैस्टोरेंट को रेस्त्रां बोलना नहीं आता। बहुत लोगों को यह नहीं पता होता कि प्रतिपुष्ठि फीडबैक  को कहते हैं। रेलगाड़ी शब्द जिसे हम ट्रेन के स्थान पर हिन्दी में प्रयोग करते है वो ही हमारी भाषा का शब्द नहीं है। हम लौहपथगामिनी तो कभी बोलते ही नहीं। किसे पता है कि लकड़म पकड़म भागम भाग गुत्यम प्रतियोगिता किस बला का नाम है। हम तो इसे क्रिकेट के नाम से ही जानतें हैं । बच्चों की बात छोडिये आज हममें से भी अधिकतर लोगों को यह नहीं  पता कि अनुस्वार, चन्द्र बिन्दु और विसर्ग क्या होते हैं ?

हिन्दी के पूर्णविराम के स्थान पर अंग्रेजी  के फुलस्टाप का प्रयोग होने लगा है। अल्पविराम का दुरूपयोग  तो यदा कदा देखने को मिल जाता है किन्तु अर्धविराम का प्रयोग तो लुप्त ही हो गया है। समस्या तो यह है कि  परतंत्र में तो हिन्दी का विकास होता रहा,  किन्तु जब से देश स्वतन्त्र हुआ, इसके  विकास  की दुर्गति होनी शुरू हो गई। स्वतन्त्रता के बाद हिन्दी को राष्ट्रभाषा के स्थान पर राजभाषा का दर्जा दिया गया। विदेश से प्रभावित शिक्षा नीति ने भी अग्रेंजी को अनिवार्य बना दिया गया। हिन्दी की शिक्षा दिनों दिन मात्र औपचारिकता बनते चली गई। दिनों दिन अंग्रेजी माध्यम वाले कान्वेंट स्कूलों  के प्रति मोह बढता जा रहा है।

हिन्दी भाषा के प्रचार के लिए सिनेमा एक बढिया माध्यम है किन्तु भारतीय सिनेमा में हिन्दी फिल्मों की भाषा हिन्दी न होकर हिन्दुस्तानी है जो कि हिन्दी व अन्य भाषाओं की खिचडी है। इसके कारण ही लोग हिन्दुस्तानी भाषा को हिन्दी समझने लगे और आज आलम यह है कि उन्हें हिन्दी भाषा ही मुश्किल लगने लगी। दूसरा प्रभावशाली माध्यम है मीडिया किन्तु टीवी के निजी चैनलों ने हिन्दी में अग्रेंजी की मिलावट करके हिन्दी को ही गड्डे में डाल दिया| चैनलों में प्रदर्शित होने वाले विज्ञापनों में हिन्दी की चिन्दी करने में सोने पर सुहागे का काम किया। हिन्दी के समाचार पत्र जिन पर लोगों को आंख बन्द करके भी विश्वास करना कबूल है, ने भी हिन्दी को खत्म करने का बीड़ा ही उठा लिया है। व्याकरण की गल्तियों पर तो ध्यान देना ही बन्द हो गया है। पाठकों का हिन्दी ज्ञान अधिक से अधिक दूभर होता जा रहा है। अगर वक्त रहते हमने हिंदी की अशुद्धियों को खाने के साथ नहीं खाया तो अपने ही देश में अंग्रेज कहलाने लगेंगे।

भारतीय मानक समय(इंडियन स्टैंडर्ड टाइम) की स्थापना

भारतीय मानक समय(आईएसटी) की स्थापना 1 सितम्बर 1947 को हुई थी। समय के इस पैमाने को  नामने का अर्थ भारतीय समय की अंतराष्ट्रीय मानक समय ग्रीनविच मीन टाइम(जीएमटी) से तुलना करने से है।  जीएमटी का निर्धारण इंग्लैंड के ग्रीनविच में स्थित ऑब्जर्वेटरी से होता है।

भारतीय मानक समय(आईएसटी) जीएमटी से साढ़े पांच घंटे आगे है। अर्थात इंग्लैंड में जब दोपहर का 12 बजे का समय होता है, तब भारत में शाम के 5:30 बजे होते हैं। सभी देशो का समय इसी आधार पर ही तय किया जाता है।

हालांकि सभी देशों के समय का निर्धारण ग्रीनविच मीन टाइम के आधार पर किया जाता है लेकिन एक देश ऐसा भी है जो इसका अपवाद है। उत्तर कोरिया ने दुनिया के समय मापने के इस तरीके को सिरे से नकार दिया है। उसने 14 अगस्त रात 12 बजे से खुद का अपना टाइम ज़ोन तय किया हुआ है। उत्तर कोरिया ने अपनी घडी को 30 मिनट पीछे कर रखा है।

गुजरात सरकार की कमियों की कहानी है पटेल आरक्षण आंदोलन

आरक्षण, एक ऐसा मुद्दा जिसने देश को जातिवाद के रंग में रंगने का काम बखूबी किया है। आरक्षण जाति के तौर पर सरकार से मिलने वाला एक ऐसा प्रसाद है जिसने देश के लोगों को काम करने की बजाये इस ओर ज्यादा प्रोत्साहित किया है कि बिना मेहनत किये या कम मेहनत किये कुछ हासिल करना है तो आरक्षण को हक़ मानकर उसके लिए मांग शुरू कर दो। जाति को आधार बनाकर राजनीति करने वालों ने भी आरक्षण को हथियार बनाकर लोगों को बांटने का काम बखूबी किया है। पिछले कुछ समय में आरक्षण मांगने वाली विभिन्न जातियों के लोगों ने सरकार को झुकाने के लिए आरक्षण का अलाप कई बार गाया है, फिर भले ही वो लोग आर्थिक तौर पर समृद्ध हो या कमज़ोर। हरियाणा के जाट समुदाय का आरक्षण की मांग तथा गुजरात का पटेल आंदोलन इसके सटीक उदाहरण हैं।  ये दोनों समुदाय आर्थिक रूप से समृद्ध हैं किन्तु आरक्षण की मांग पर अड़े हैं।

395553-hardikpatelअहमदाबाद में उमड़ा पटेल समुदाय के लोगों का विशाल हजूम इस बात की और इशारा करता है कि आरक्षण की मांग को लेकर पटेल अब एकजुट हो गए हैं। पटेल समुदाय गुजरात में आर्थिक रूप से काफी समृद्ध लोगों का समुदाय है। तो आखिरकार ऐसा क्या हुआ कि अचानक से यह समुदाय आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन पर उत्तर आया? किसने इतने बड़े जनसैलाब की नींव रखी? गुजरात में इन दिनों आरक्षण की आग भड़की हुई है जिसका नेतृत्व कर रहा है एक 25 साल का लड़का। इस 25 साल के लड़के ने पूरे गुजरात की राजनीति को हिलाकर रख दिया है। इस नौजवान ने गुजरात में अबतक 80 से ज्यादा रैलियां की हैं। गुजरात में तूफ़ान बनकर आए इस शख्स का नाम है “हार्दिक पटेल। 2 महीने पहले तक परिवार, दोस्तों और पड़ोसियों के अलावा शायद ही कोई हार्दिक को जानता हो। 2 महीने के इस वक्त में साधारण कद-काठी के इस युवा ने पाटीदार आरक्षण आंदोलन के झंडे तले जो जनसैलाब इकट्ठा किया है, वह अभूतपूर्व है।

आरक्षण को लेकर हार्दिक ने इस आंदोलन कि शुरुआत तब की जब वो खुद इसका शिकार बना। उसके पड़ोसी लड़के को कम नंबर के बावजूद सरकारी नौकरी मिल गई और वो मुंह देखता रहा। हार्दिक ने जब युवाओं की बात को मंच पर उठाना शुरू किया तो उसे मंझे हुए नेताओं ने भी तवज्जो नहीं दी। तब हार्दिक ने बीते जुलाई में “पाटीदार अनामत आंदोलन” की नींव डाली। उन्होंने पटेल समुदाय के युवाओं के साथ आरक्षण के नाम पर हो रहे भेदभाव के खिलाफ बिगुल बजाते हुए सरकार को चेतावनी दे दी कि यदि पटेल जाती को अन्य पिछड़ा वर्ग(ओबीसी) की श्रेणी में नहीं लाया गया तो 2017 के विधानसभा चुनाव में “कमल” नहीं खिलने देंगे। “पाटीदार अनामत आंदोलन समिति” के नेता हार्दिक पटेल की इस चेतावनी ने से भाजपा के माथे पर पसीने की नदी बहा दी है। पटेल समुदाय का भाजपा की जीत में हमेशा से ही विशेष योगदान रहा है। पटेल समुदाय समृद्ध, दबंग तथा संख्यात्मक रूप से प्रभावशाली है।

प्रशन यह उठता है कि गुजरात में आरक्षण की मांग करने वाला यह जनसमूह अचानक से कहाँ से निकल आया? अहमदाबाद में 10 लाख से भी ज्यादा पाटीदार क्या रेगिस्तान में उड़ने वाले तूफ़ान की तरह आ गए थे? 1985 में ओबीसी आरक्षण का सबसे अधिक विरोध करने वाले ही आखिर अचानक से आरक्षण के मांग क्यों करने लगे? यहाँ अचानक का मतलब 50 दिन के बहुत ही कम समय से है। बीते 6 जुलाई से पहले तो उजरात में आरक्षण के विषय में चर्चा तक नहीं थी, ना इतना बड़ा जनसैलाब एकजुट था, ना ही आरक्षण को लेकर किसी प्रकार का गुस्सा।

छः जुलाई को मेहसाना में पटेल समुदाय के लोगों की एक रैली हुई, जिसमें 5000 लोग इकट्ठे हुए। किन्तु इस रैली को ना तो नेताओं ने तवज्जो दी, ना पुलिस ने और ना ही मीडिया ने। 2 दिन बाद मेहसाना के पास ही विषनगर में दूसरी रैली हुई। जुटे तो यहाँ भी तकरीबन उतने ही लोग लेकिन मीडिया में यह मुद्दा उस समय सामने आया जब विषनगर के पाटीदारों ने अपने गुसैल स्वाभाव का परिचय देते हुए वहां के विधायक ऋषिकेश पटेल के दफ्तर पर हमला कर दिया। तब जाकर मीडिया का ध्यान इस और गया। अखबारों में इसकी थोड़ी बहुत चर्चा हुई। आरक्षण आंदोलन भी सबकी नज़रों में अाया और हार्दिक पटेल भी।

विषनगर की इस रैली के बाद तो जैसे तूफ़ान ही आ गया। जिला व तहसील स्तर  पर रोज छोटी छोटी रैलियां करके पाटीदारों को इकट्ठा करने का प्रयत्न किया गया। पटेलों की लगातार रैलियां होने लगीं और लगातार घोषणाएं भी सामने आने लगीं। जिसके बाद इन्होने सूरत में बड़ी रैली करनी की घोषणा की। जिसका मुख्य उद्देश्य सूरत व उसके आसपास के पाटीदारों का समर्थन हासिल करना था। 7 लाख के करीब पाटीदार सूरत में इकट्ठा हुए। ये सब रैलियां शांतिपूर्ण तरीके से हुयी, इसलिए इन रैलियों में जुटने वाली भीड़ ने पाटीदारों के हौसले को और बड़े पंख लगा दिए। इतनी संख्या में पाटीदारों को खुद के विरुद्ध खड़ा देखकर सरकार के पसीने भी छूटने लगे। जिस दिन सूरत रैली हुई, उसी दिन पटेल समुदाय के नेताओं को सरकार ने बातचीत का न्यौता दिया। किन्तु आनंदीबेन पटेल सरकार के लिए उनकी आरक्षण की मांग को स्वीकार कर लेना आसान नहीं है। इसलिए गुजरात सरकार ने भी कह दिया कि “अनामत तो नहींज मिले” मतलब “आरक्षण तो नहीं मिलेगा”।

सरकार के  इस इनकार से पटेलों ने अपने स्वर में आक्रोश भर लिया और उन्होंने उसके बाद यह घोषणा कर दी कि 25 अगस्त को अहमदाबाद में होने वाली महारैली से पहले सरकार से कोई बातचीत नहीं होगी। इस रैली में पहले से भी अधिक भीड़ जुटी। 10 लाख से भी ज्यादा पाटीदार इस रैली में शामिल हुए। जहाँ सब रैलियां शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुयी थी वहीँ इस रैली ने हिंसक रूप ले लिया। जिसमें 8 लोगों की जान भी चली गयी।

लेकिन क्या सरकार कि गलतियों को अनदेखा किया जा सकता है? या यूं कहा जा सकता है कि सरकार की कमियों की कहानी ही है पटेल आरक्षण आंदोलन? क्या गुजरात जातिवाद राजनीति में प्रवेश कर रहा है? लेकिन इसका जिम्मेदार कौन हैं? आरक्षण की आग को हवा देने में भाजपा का भी पूरा योगदान है। सत्ता में आने के बाद नरेन्द्र मोदी सरकार ने जाट आरक्षण तथा महाराष्ट्र में फड़नवीस सरकार ने  मराठा आरक्षण पर रूख तय करते हुए पूर्व कांग्रेस सरकारों के मजबूरी में उठाए गए क़दमों का कोर्ट में बचाव किया, जिस पर कोर्ट ने उन्हें कड़ी फटकार लगायी। लेकिन केंद्र अब तक इन समृद्ध तथा दबंग समुदायों को आरक्षण देने का समर्थन कर रहा है। तो फिर कैसे पटेल, ब्राह्मण तथा अन्य जातियां आरक्षण की मांग पर पीछे रह सकती हैं?

पटेलों के इतना बड़ा आंदोलन सरकार की कमियों की पोल खोलने के लिए काफी है। सरकार के पास बातचीत का पर्याप्त समय था। सरकार चाहती तो रणनीति भी बना सकती थी और पटेलों से बातचीत का दौर भी जारी रख सकती थी। लेकिन किसी ने कुछ न सोचा और ना किया, और दो टूक जवाब देकर इतने बड़े आंदोलन को जन्म दे दिया। सरकार के पास इस समस्या से निपटने की अपनी कोई तैयारी नहीं थी। सरकार केवल पाटीदारों की भीड़ से डरकर बौखला रही थी। करना क्या है, यह बिलकुल भी स्पष्ट नहीं था। सरकार की बोखलाहट पर पुलिस ने भी मुहर लगा दी। सरकार के बाद पुलिस ने भी अहमदाबाद रैली को हिंसक रूप लेने में अपना योगदान दे दिया।

सभी रैलियों की तरह अहमदाबाद रैली भी शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुई। सब लोग अपने घर को लौट रहे थे। जीएमडी मैदान पर जहाँ हार्दिक पटेल धरना दे रहे थे वहां केवल 4000 पाटीदार ही बचे थे, लेकिन पुलिस ने अपनी बौखलाहट का परिचय देते हुए वहां लाठीचार्ज कर दिया। यह खबर आग की तरह फैल गयी और पटेल समुदाय के जो लोग अभी घर भी नहीं पहुंचे थे, उन्होंने वही तोड़फोड़ शुरू कर दी। जहाँ से गुजरात में हिंसा ने जन्म ले लिया। रैली से पहले सरकार ने रैली में पहुँच रहे लोगों के टोल टैक्स ना देने तथा रैली के पुख्ता इंतज़ाम, सुरक्षा जैसी कई मांगों को मान लिया था तो फिर सरकार को इतनी जल्दी हार्दिक की धरपकड़ करने की क्या जरूरत आन पडी थी। देर रात तक गुज़रात की मुख्यमंत्री भी इस पर अपनी सफाई देती रही कि यह निर्णय पुलिस का है लेकिन तब किसको सुननी थी, हिंसा तो जन्म ले चुकी थी।

सरकार को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना होगा। उन्हें इस समस्या के निपटारे की रणनीति सुनिश्चित करनी होगी। उन्हें पटेल समुदाय के लोगों से लगातार बातचीत करनी होगी। आरक्षण मामले में सिद्दांतनिष्ठ और समरूप रवैया ना अपनाने के कारण ही गुजरात सरकार इस नयी राजनीतिक मुसीबत में फसी है। सरकार को यह समझना होगा कि पटेलों को आरक्षण देने से अन्य समाज भी इसके लिए सक्रिय होंगे। सरकार को अपनी गलतियों से सबक लेते हुए इस विषय पर आत्म-मंथन की आवश्यकता है। अब देखना यह है कि भाजपा और अन्य पार्टियां इससे कोई सबक लेंगी? गुजरात सरकार को पुलिस के रूख पर भी कार्यवाही सुनिश्चित करनी होगी ताकि पाटीदारों से बातचीत के दौरान पुलिस के इस रवैये पर अपना पक्ष रख सके।

फादर ऑफ़ एसएमएस

कुछ ही दिन पहले त्यौहारों पर एसएमएस भेजने का सिलसिला शायद ही कोई भूला होगा। इतने एसएमएस भेजे जाते थे कि मोबाइल नेटवर्क ही ठप्प हो जाते थे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया को एसएमएस की सौगात देने वाले शख्स कौन हैं? तो आईये हम आपको बताते हैं की वो कौन हैं जिन्होंने एसएमएस की शुरुआत की।

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फिनलैंड के “मैटी मैक्नन” ही वो शख्स थे जिन्होंने दुनिया को 160 कैरेक्टर में सन्देश भेजने का यह तोहफा दिया। मैक्नन को इस शार्ट मैसेजिंग सर्विस(एसएमएस) का ख्याल पिज्जा खाते समय आया था। 1984 में डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में एक टेलीकॉम कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने गए मैक्नन को लांच के दौरान पिज्जा खाते समय ये ख्याल आया कि यदि मोबाइल बंद हो जाए तो किसी से कैसे संपर्क किया जाए? कॉन्फ्रेंस में मौजूद लोग अभी जवाब सोच ही रहे थे कि मैक्नन ने “टैक्स्ट मैसेज सर्विस” का कॉन्सेप्ट सबके सामने रखा लेकिन सबने इसे खारिज कर दिया।

1985 में शोधकर्ता फ्रीडहैम हिलब्रांड और उनकी टीम के साथ मिलकर मैक्नन ने शार्ट मैसेजिंग सर्विस पर चुपचाप काम करना शुरू कर दिया। 1992 में पहला एसएमएस भेजा गया तथा 1994 में नोकिया का मैसेज टाइपिंग वाला पहला फोन लॉन्च हुआ जिसके बाद एसएमएस के सर्विस पूरी दुनिया में लोकप्रिय हुई। मैसेज भेजने कि सर्विस भले ही “शार्ट मैसेजिंग सर्विस” के नाम से लोकप्रिय हुई थी लेकिन वो इसका नाम मैसेज हैंडलिंग सर्विस ही मानते थे। वे इसे कम शब्दों में सन्देश भेजने का जरिया मानते थे। उनके लिए यह भाषा के विकास का नया तरीका था। मैटी मैक्नन ने इस टेक्नोलॉजी से पैसा नहीं कमाया। उन्होंने इसका पेटेंट तक नहीं करवाया। “फादर ऑफ़ एसएमएस” कहने पर वो चिड़ जाया करते थे। अभी हाल ही में 63 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

राजनीति, प्रतिद्वंद्वी बनकर कीजिये दुश्मन बनकर नहीं

राजनीति एक ऐसा विशाल सागर है जिसमें छोटे बड़े राजनेता अपने प्रतिद्वन्द्वियों को हराकर सत्ता अपने हाथ में रखना चाहते हैं। राजनीतिक लिहाज़ से भले ही उनमें कई मतभेद हों लेकिन निजी तौर पर उनमें मनमुटाव नहीं होता। लेकिन भारत की मौजूदा राजनीति इसके बिलकुल विपरीत है। नरेंद्र मोदी बनाम सोनिया गांधी इसी बात का सबसे माकूल उदाहरण है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच मनमुटाव अब तक राजनीतिक रैलियों में ही नजर आता था लेकिन अब तो संसद में भी इस मनमुटाव ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है। इन दोनों राजनीतिक दिग्गजों का किसी भी बात पर आपस में असहमति जताना इस बात की पुष्टि करता है कि यह अनबन केवल राजनीतिक नहीं है बल्कि इसके पीछे कोई निजी कारण है।

हाल ही में मानसून का बर्बाद हुआ सत्र भी इसी बात की और इशारा करता है कि यह केवल पक्ष बनाम विपक्ष अथवा कांग्रेस बनाम भाजपा वाली राजनीती का नतीजा नहीं है, बल्कि यह ऐसे राजनेताओं के मनमुटाव का प्रतिफल है जो एक दूसरे को कतई पसंद नहीं करते हैं। इन दोनों के झगडे को देखकर तो ऐसा ही लगता है कि ये दोनों राजनेता एक दूसरे को राजनीतिक रूप से खत्म करने पर तुले हैं। यही कारण है कि ये दोनों दिग्गज राजनेता ना तो किसी मुद्दे पर सहमत होते हैं और ना ही आपस में कोई कामकाजी रिश्ता विकसित कर पाते हैं, भले ही उसमें जनता का हित ही क्यों ना हो। मानसून सत्र में देश को जो नुकसान हुआ, मोदी बनाम सोनिया उसका एकमात्र कारण है। इन दोनों की जिद के कारण ही संसद में लगातार गतिरोध की  परिस्थिति बनी रही।

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हालांकि राजनीति में ऐसा मनमुटाव पहली बार देखने को नहीं मिला। राज्य विधानसभाओं में ऐसा पहले भी देखा जा चुका है।  मायावती बनाम मुलायम सिंह यादव, जयललिता बनाम करूणानिधि तथा और भी ऐसे कई किस्से है जिनमें राजनीति के दिग्गजों में निजी मतभेद देखा गया है। मोदी और सोनिया की इस दुश्मनी का लंबा इतिहास रहा है। वर्ष 2007 के गुजरात चुनाव में सोनिया ने 2002 के दंगों को तूल देकर मोदी पर “मौत का सौदागर” होने की टिप्पणी कर दी थी। लेकिन नरेंद्र मोदी ने भी इसके बदले में कोई कसर नहीं छोड़ी। 2002 में उन्होंने सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को उठाकर आसान जीत दर्ज की थी। कुछ वर्ष पहले भी मोदी  ने कांग्रेस नेता को अपमानजनक ढंग से सम्बोधित किया था। इन दोनों का एक दूसरे के प्रति रवैया केवल राजनीतिक मतभेद तो नहीं हो सकता। इन दोनों की यह लड़ाई चुनावी हार जीत से बहुत परे चली गयी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषणों में कई बार कांग्रेस मुक्त भारत की बात की है। इससे इस बात को तो साफ़ तौर पर पर देखा जा सकता है कि वे कांग्रेस को केवल पराजित ही नहीं करना चाहते हैं बल्कि खत्म कर देना चाहते हैं। आरएसएस पृष्ठभूमि से जुड़े होने के कारण भी मोदी हमेशा से ही जवाहरलाल नेहरू को नापसंद करते आये हैं। इसकी झलक उनके भाषणों में साफ दिखाई देती है। उन्होंने अपने भाषणों में नेहरू के योगदान को कभी महत्त्व नहीं दिया, जबकि सरदार पटेल, सुभाष चन्द्र बोस, लाल बहादुर शास्त्री तथा महात्मा गांधी का गुणगान करते उन्हें कई बार देखा गया है। उनके भाषणों से ऐसा लगता है मानो मोदी नेहरूवादी विरासत को देश की राजनीति से हमेशा के लिए मिटा देना चाहते हों। लेकिन वे ये बात भी भूल रहे हैं कि किसी की राजनीतिक विरासत को ख़त्म कर देना भाषण देने जितना आसान काम नहीं है।

नरेंद्र मोदी भले ही जवाहरलाल नेहरू को पसंद ना करते हों लेकिन इस बात को झुठला नहीं सकते की देश का पहला प्रधानमंत्री होने का गौरव उन्हें ही प्राप्त है और राजनीति में उनके योगदान भाषणों में उनका नाम न लेने से कम नहीं होगा। इसलिए उनके नाम को देश की राजनीति से मिटाना समझदारी का नहीं अपितु द्वेष का प्रमाण होगा। सोनिया गांधी ने भी समय रहते शायद इसे भांप लिया है, तभी तो अचानक कांग्रेस की कमान अपने हाथों में ले ली है, साथ ही पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भरते हुए उन्हें मोदी से ना डरने के लिए प्रेरित भी करती नज़र आ रही हैं। संसद में मानसून सत्र के दौरान उनका आक्रोश भरा रूख इस बात की पुष्टि करता है। उनके सख्त रवैये ने इस बात को तो साफ़ बता दिया कि खुद के संरक्षण तथा परिवार की विरासत बचने के लिए वे कुछ भी कर सकती हैं। मोदी को कड़ी चुनौती देने के लिए इसीलिए सोनिया गांधी बार बार मोदी की धर्मनिरपेक्षता को कटघरे में खड़ा कर देती है। आरएसएस से जुड़े होने के कारण मोदी को भी इस पर मौन रहना पड़ता है।

मनमुटाव की वजह कोई भी हो। दलील कोई भी दी जा सकती है। चाहे मोदी, सोनिया गांधी के विदेशी मूल की होने की अपनी नफरत को पचा नहीं पा रहे हो या दूसरी तरफ सोनिया गांधी मोदी के प्रधानमंत्री बनने को अभी तक स्वीकार नहीं कर पायी हो। असलियत यही है कि 2002  से चली आ रही इस लड़ाई में देश का बहुत नुकसान हो चुका है। नरेंद्र मोदी अब बहुमत दल कि सरकार के प्रधानमंत्री है तथा सोनिया गांधी सबसे बड़े विपक्ष दल कि अध्यक्ष। दोनों को राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बनकर काम करना होगा दुश्मन बनकर नहीं। दोनों देश कि राजनीति में महत्वपूर्ण रुतबा रखते हैं। इसलिए दोनों को एक दूसरे से व्यवहार करना आना चाहिए। एक दूसरे के प्रति लगातार मनमुटाव उत्पन्न करके संसदीय व्यवस्था को शर्मसार करने कि बजाये मिलकर देश कि राजनीति में अपना योगदान दें, जिससे देश नुकसान से भी बच जाएगा और जनता के हित के बारे में भी सोचा जा सकेगा।