भारतीय मानक समय(इंडियन स्टैंडर्ड टाइम) की स्थापना

भारतीय मानक समय(आईएसटी) की स्थापना 1 सितम्बर 1947 को हुई थी। समय के इस पैमाने को  नामने का अर्थ भारतीय समय की अंतराष्ट्रीय मानक समय ग्रीनविच मीन टाइम(जीएमटी) से तुलना करने से है।  जीएमटी का निर्धारण इंग्लैंड के ग्रीनविच में स्थित ऑब्जर्वेटरी से होता है।

भारतीय मानक समय(आईएसटी) जीएमटी से साढ़े पांच घंटे आगे है। अर्थात इंग्लैंड में जब दोपहर का 12 बजे का समय होता है, तब भारत में शाम के 5:30 बजे होते हैं। सभी देशो का समय इसी आधार पर ही तय किया जाता है।

हालांकि सभी देशों के समय का निर्धारण ग्रीनविच मीन टाइम के आधार पर किया जाता है लेकिन एक देश ऐसा भी है जो इसका अपवाद है। उत्तर कोरिया ने दुनिया के समय मापने के इस तरीके को सिरे से नकार दिया है। उसने 14 अगस्त रात 12 बजे से खुद का अपना टाइम ज़ोन तय किया हुआ है। उत्तर कोरिया ने अपनी घडी को 30 मिनट पीछे कर रखा है।

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फादर ऑफ़ एसएमएस

कुछ ही दिन पहले त्यौहारों पर एसएमएस भेजने का सिलसिला शायद ही कोई भूला होगा। इतने एसएमएस भेजे जाते थे कि मोबाइल नेटवर्क ही ठप्प हो जाते थे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया को एसएमएस की सौगात देने वाले शख्स कौन हैं? तो आईये हम आपको बताते हैं की वो कौन हैं जिन्होंने एसएमएस की शुरुआत की।

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फिनलैंड के “मैटी मैक्नन” ही वो शख्स थे जिन्होंने दुनिया को 160 कैरेक्टर में सन्देश भेजने का यह तोहफा दिया। मैक्नन को इस शार्ट मैसेजिंग सर्विस(एसएमएस) का ख्याल पिज्जा खाते समय आया था। 1984 में डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में एक टेलीकॉम कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने गए मैक्नन को लांच के दौरान पिज्जा खाते समय ये ख्याल आया कि यदि मोबाइल बंद हो जाए तो किसी से कैसे संपर्क किया जाए? कॉन्फ्रेंस में मौजूद लोग अभी जवाब सोच ही रहे थे कि मैक्नन ने “टैक्स्ट मैसेज सर्विस” का कॉन्सेप्ट सबके सामने रखा लेकिन सबने इसे खारिज कर दिया।

1985 में शोधकर्ता फ्रीडहैम हिलब्रांड और उनकी टीम के साथ मिलकर मैक्नन ने शार्ट मैसेजिंग सर्विस पर चुपचाप काम करना शुरू कर दिया। 1992 में पहला एसएमएस भेजा गया तथा 1994 में नोकिया का मैसेज टाइपिंग वाला पहला फोन लॉन्च हुआ जिसके बाद एसएमएस के सर्विस पूरी दुनिया में लोकप्रिय हुई। मैसेज भेजने कि सर्विस भले ही “शार्ट मैसेजिंग सर्विस” के नाम से लोकप्रिय हुई थी लेकिन वो इसका नाम मैसेज हैंडलिंग सर्विस ही मानते थे। वे इसे कम शब्दों में सन्देश भेजने का जरिया मानते थे। उनके लिए यह भाषा के विकास का नया तरीका था। मैटी मैक्नन ने इस टेक्नोलॉजी से पैसा नहीं कमाया। उन्होंने इसका पेटेंट तक नहीं करवाया। “फादर ऑफ़ एसएमएस” कहने पर वो चिड़ जाया करते थे। अभी हाल ही में 63 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

इलैक्ट्रॉनिक ट्रैफिक सिग्नल का जन्म

विश्व में लगातार तेज़ी से बढ़ रहे आधुनिकीकरण ने जहाँ लोगों की ज़िंदगी को आसान बना दिया है , वही इसने कुछ समस्यायों को भी जनम दिया है। जिसमें से एक है ट्रैफिक की समस्या। जहाँ भी जाओ गाड़ियों के चहल पहल नज़र आ ही जाती है। आज के समय में नाममात्र लोग ही होंगे जो कहीं आने जाने के लिए वाहन का प्रयोग ना करते हों। हर कोई अपना समय बचाने के लिए किसी ना किसी वाहन से सफर करता है। लेकिन इस नए युग की इस सुविधा ने ट्रैफिक की समस्या उत्पन्न कर दी है। इसी समस्या के चलते लोग घंटों तक जाम में फंसे रहते हैं। कई बार तो एम्बुलैंस भी ऐसे जाम में फंस जाती है जिससे किसी की जान तक चली जाती है। लेकिन एक ऐसी तकनीक जिसने इस ट्रैफिक की समस्या को पूरी तरह से समाप्त तो नहीं किया  लेकिन काफी हद तक सुधार अवश्य दिया। इस तकनीक का नाम है ” इलैक्ट्रोनिक ट्रैफिक सिग्नल प्रणाली“. जिसे हम स्थानीय भाषा में रेड लाइट ट्रैफिक सिग्नल भी बोल देते हैं। तो चलिए जानते हैं कि इस तकनीक कआ जन्म कहाँ हुआ और कहाँ इसे सबसे पहले प्रयोग किया गया था?

तस्वीर में एक व्यक्ति ट्रैफिक सिग्नल लगाता हुआ
तस्वीर में एक व्यक्ति ट्रैफिक सिग्नल लगाता हुआ

सड़कों पर यातायात की समस्या को नियंत्रित करने का श्रेय यूनाइटिड स्टेट्स अमेरिका को जाता है। अमेरिका पहला ऐसा देश बना जहाँ पर सबसे पहले यातायात की बढ़ती तादात को आँका गया। हालांकि इस तकनीक के प्रयोग से पहले भी अमेरिका की सड़कों पर ट्रैफिक पुलिस अधिकारी यातायात को संभालते थे लेकिन अब ये उनके लिए नियत्रित कर पाना भी मुश्किल हो रहा था। इस तकनीक का मुख्य उद्देश्य ना केवल ट्रैफिक को नियंत्रित करना था बल्कि सड़क हादसों पर लगाम कसना भी था। इसका प्रयोग सबसे पहले चौराहों पर ही किया गया किन्तु आजकल कई बड़े महानगरों में इसे चौराहों के अलावा अन्य जगहों पर भी देखा जाता है, जहाँ पर लोगों की चहलकदमी अधिक है।

विश्व का पहला इलैक्ट्रोनिक ट्रैफिक सिग्नल 5 अगस्त, 1914  को अमेरिका के ओहायो राज्य के क्लीवलैंड शहर की “105  वी  एंड यूक्लिड” सड़क पर लगाया गया था। इसे “जेम्स हॉग” ने डिजाइन किया था। कुछ अन्य शहरों में सफलतापूर्वक प्रयोग के बाद 1918 में हॉग ने इसे पेटेंट करवा लिया। हालांकि अमेरिका में डिजाइन की गयी इस तकनीक से पहले भी ट्रैफिक सिग्नल लगाए गए थे। इसे 9 दिसंबर 1868 को यूनाइटिड किंगडम के लंदन में ब्रिटिश संसद के पास लगाया गया था। किन्तु यह प्रयोग सफल नहीं हुआ। ये गैस आधारित ट्रैफिक सिग्नल थे जिसमें अचानक विस्फोट हो जाता था। अमेरिकी इलैक्ट्रॉनिक ट्रैफिक सिग्नल प्रणाली  ने ट्रैफिक के नियंत्रण को ना केवल एक दिशा प्रदान की बल्कि उन पुलिस कर्मियों को भी राहत दी जो ट्रैफिक नियंत्रित करने के लिए कई बार अपनी जान तक जोखिम में डाल देते थे। जिन शहरों में इसका प्रयोग किया गया वहां जन-चेतना के लिए कई प्रोग्राम किये गए जिससे कि लोगों को इस इलैक्ट्रोनिक ट्रैफिक प्रणाली के बारे में जागरूक किया जा सके। इसमें लाल व् हरे रंग की लाईट का प्रयोग किया गया था। लोगों को इन लाइटों को लगाने का अर्थ समझाया गया। धीरे-धीरे ये तकनीत विश्व भर में प्रचलित हो गयी। आज ज्यादातार देशों में इस प्रणाली को प्रयोग किया जा रहा है.।