पुरुषवादी सोच ! सही या गलत? – महिला दिवस पर विशेष

महिला दिवस 8 मार्च का दिन, आज उन लोगों की फेसबुक वॉल पर भी महिलाओं के सम्मान में तस्वीरे, सम्मानजनक सन्देश प्रकाशित देखे जिनके मुख से चंद लाइने भी माँ-बहन की गाली के बिना निकलती नहीं देखि मैंने कभी. अच्छा लगा कि चाहे एक दिन ही सही ये लोग अपनी जिह्वा पर नियंत्रण तो रख पाते हैं. लेकिन फिर समझने का प्रयत्न भी करता हूँ कि ऐसे सम्मान का क्या लाभ जो साल में एक दो दिन केवल दिखावे के लिए किया जाए. लेकिन ये नारीवाद बनाम पुरुषवाद का पुराना बोया हुआ कीड़ा हमारे दिमाग से इतनी जल्दी भला कैसे निकल सकता है.. ? नारीवाद और महिला सशक्तिकरण दरअसल दो ऐसे शब्द हैं जिन्हें प्रोत्साहन तो अवश्य मिलता है किन्तु स्थान नहीं,, न दिल में ना समाज में.. नारीवाद और महिला सशक्तिकरण ना तो पुरुषों के खिलाफ कोई लड़ाई है और ना ही पुरुषों को कमजोर करने की प्रक्रिया. सच माने तो पुरुषों के खिलाफ तो कोई लड़ाई है ही नहीं और हो भी क्यों? आखिर उनके बिना भी तो सृष्टी की कल्पना व्यर्थ है.

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अपने इस लेख से मैं पुरुषों से किसी भी प्रकार का विरोध जाहिर नहीं कर रहा हूँ, और पुरुष होने के नाते मुझे ऐसा करना शोभा भी नहीं देता लेकिन हाँ मैं उस पुरुषवादी विचारधारा के हरगिज विरोध में हूँ जो पुरुष को प्रधान बताती है और महिलाओं के लिए कुछ कार्यों का निर्धारण करती है कि उन्हें ये काम नहीं करने चाहिए. विरोध उस बड़ी आबादी का है जो पुरुषवादी सोच से ग्रसित है. और जरूरी नहीं ये सोच एक पुरुष ही रखता हो. ये सोच एक माँ की हो सकती है जो अपनी बेटी को कम बोलने, धीरे हँसने, बाहर ना खेलने और नजरें झुका कर चलने की सलाह छोटी उम्र से देना शुरू कर देती है. ये सोच एक पिता की हो सकती है जो अपनी बेटी को साइकिल चलाने, स्कूल जाने, स्कूटी चलाने, और सिनेमा जाने से रोकती है. ये सोच उस भाई की हो सकती है जिसे अपनी बहन के कहीं घूमने जाने पर आपत्ति है. ये सोच उस समाज की हो सकती है जो किसी बेटी के माता-पिता पर उसकी शादी जल्दी कर देने का निरंतर दबाब बनाते हैं ताकि कहीं वो कुछ बनकर ना दिखा दे. ये सोच उस लड़के की भी हो सकती है जो अपनी गर्लफ्रेंड के चरित्र पर सवाल केवल इसलिए उठा देता है क्योंकि वह और लड़कों से बात या दोस्ती कर लेती है. ये सोच उस पति की भी हो सकती है जो बिना मर्जी के अपनी पत्नी को शारीरिक संबंध बनाने को मजबूर करता है सिर्फ इसलिए क्योंकि वो उसे ब्याह के लाया है? ये सोच उस पंचायती ढाँचे की भी हो सकती है जिसे लड़कियों के जीन्स पहनने, बैकलेस कपडे पहनने, मोबाइल रखने पर आपत्ति है या फिर उन धर्म के ठेकेदारों की जिनको धार्मिक स्थलों पर उस नारी के प्रवेश से आपत्ति है जिससे सृष्टि का निर्माण हुआ है.

समस्या महिला नहीं है वह तो अपनी लग्न और मेहनत से समाज को सुन्दर बनाना चाहती हैं. समस्या की जड़ तो केवल हमारी पुरुषवादी सोच है जिसे बदलने की बहुत अधिक आवश्यकता है, भरोसा जताने की आवश्यकता है, विश्वास कीजिये नतीजे हमेशा अच्छे आये हैं. जरूरत महिलाओं के नाम पर सोशिअल मीडिया पर एक दिन की क्रान्ति दिखाने की नहीं है जरूरत है तो उन्हें मन से सम्मान देने की है. उनके साथ खड़े रहकर उन्हें जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने की है. जरूरत उन्हें बराबर मानने की है. उन्हें अपनी जिंदगी को जीने की आज़ादी देने की है. ऐसा करके देखिये जनाब आपकी बेटी, आपकी बहन, आपकी मित्र एक और ” मदर टेरेसा “, ” इंदिरा गांधी “, ” प्रतिभा देवी सिंह पाटिल “, ” किरण बेदी “, ” सुष्मिता सेन “, ” सानिया मिर्ज़ा ” बनकर आपको पूरे विश्व के सामने सम्मानित करने के लिए तैयार बैठी है. बस उसके कदम रोकने की बजाये कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित करें. लेख अच्छा लगे तो शेयर अवश्य कीजियेगा. धन्यवाद !

गोविन्द सलोता

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गुजरात सरकार की कमियों की कहानी है पटेल आरक्षण आंदोलन

आरक्षण, एक ऐसा मुद्दा जिसने देश को जातिवाद के रंग में रंगने का काम बखूबी किया है। आरक्षण जाति के तौर पर सरकार से मिलने वाला एक ऐसा प्रसाद है जिसने देश के लोगों को काम करने की बजाये इस ओर ज्यादा प्रोत्साहित किया है कि बिना मेहनत किये या कम मेहनत किये कुछ हासिल करना है तो आरक्षण को हक़ मानकर उसके लिए मांग शुरू कर दो। जाति को आधार बनाकर राजनीति करने वालों ने भी आरक्षण को हथियार बनाकर लोगों को बांटने का काम बखूबी किया है। पिछले कुछ समय में आरक्षण मांगने वाली विभिन्न जातियों के लोगों ने सरकार को झुकाने के लिए आरक्षण का अलाप कई बार गाया है, फिर भले ही वो लोग आर्थिक तौर पर समृद्ध हो या कमज़ोर। हरियाणा के जाट समुदाय का आरक्षण की मांग तथा गुजरात का पटेल आंदोलन इसके सटीक उदाहरण हैं।  ये दोनों समुदाय आर्थिक रूप से समृद्ध हैं किन्तु आरक्षण की मांग पर अड़े हैं।

395553-hardikpatelअहमदाबाद में उमड़ा पटेल समुदाय के लोगों का विशाल हजूम इस बात की और इशारा करता है कि आरक्षण की मांग को लेकर पटेल अब एकजुट हो गए हैं। पटेल समुदाय गुजरात में आर्थिक रूप से काफी समृद्ध लोगों का समुदाय है। तो आखिरकार ऐसा क्या हुआ कि अचानक से यह समुदाय आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन पर उत्तर आया? किसने इतने बड़े जनसैलाब की नींव रखी? गुजरात में इन दिनों आरक्षण की आग भड़की हुई है जिसका नेतृत्व कर रहा है एक 25 साल का लड़का। इस 25 साल के लड़के ने पूरे गुजरात की राजनीति को हिलाकर रख दिया है। इस नौजवान ने गुजरात में अबतक 80 से ज्यादा रैलियां की हैं। गुजरात में तूफ़ान बनकर आए इस शख्स का नाम है “हार्दिक पटेल। 2 महीने पहले तक परिवार, दोस्तों और पड़ोसियों के अलावा शायद ही कोई हार्दिक को जानता हो। 2 महीने के इस वक्त में साधारण कद-काठी के इस युवा ने पाटीदार आरक्षण आंदोलन के झंडे तले जो जनसैलाब इकट्ठा किया है, वह अभूतपूर्व है।

आरक्षण को लेकर हार्दिक ने इस आंदोलन कि शुरुआत तब की जब वो खुद इसका शिकार बना। उसके पड़ोसी लड़के को कम नंबर के बावजूद सरकारी नौकरी मिल गई और वो मुंह देखता रहा। हार्दिक ने जब युवाओं की बात को मंच पर उठाना शुरू किया तो उसे मंझे हुए नेताओं ने भी तवज्जो नहीं दी। तब हार्दिक ने बीते जुलाई में “पाटीदार अनामत आंदोलन” की नींव डाली। उन्होंने पटेल समुदाय के युवाओं के साथ आरक्षण के नाम पर हो रहे भेदभाव के खिलाफ बिगुल बजाते हुए सरकार को चेतावनी दे दी कि यदि पटेल जाती को अन्य पिछड़ा वर्ग(ओबीसी) की श्रेणी में नहीं लाया गया तो 2017 के विधानसभा चुनाव में “कमल” नहीं खिलने देंगे। “पाटीदार अनामत आंदोलन समिति” के नेता हार्दिक पटेल की इस चेतावनी ने से भाजपा के माथे पर पसीने की नदी बहा दी है। पटेल समुदाय का भाजपा की जीत में हमेशा से ही विशेष योगदान रहा है। पटेल समुदाय समृद्ध, दबंग तथा संख्यात्मक रूप से प्रभावशाली है।

प्रशन यह उठता है कि गुजरात में आरक्षण की मांग करने वाला यह जनसमूह अचानक से कहाँ से निकल आया? अहमदाबाद में 10 लाख से भी ज्यादा पाटीदार क्या रेगिस्तान में उड़ने वाले तूफ़ान की तरह आ गए थे? 1985 में ओबीसी आरक्षण का सबसे अधिक विरोध करने वाले ही आखिर अचानक से आरक्षण के मांग क्यों करने लगे? यहाँ अचानक का मतलब 50 दिन के बहुत ही कम समय से है। बीते 6 जुलाई से पहले तो उजरात में आरक्षण के विषय में चर्चा तक नहीं थी, ना इतना बड़ा जनसैलाब एकजुट था, ना ही आरक्षण को लेकर किसी प्रकार का गुस्सा।

छः जुलाई को मेहसाना में पटेल समुदाय के लोगों की एक रैली हुई, जिसमें 5000 लोग इकट्ठे हुए। किन्तु इस रैली को ना तो नेताओं ने तवज्जो दी, ना पुलिस ने और ना ही मीडिया ने। 2 दिन बाद मेहसाना के पास ही विषनगर में दूसरी रैली हुई। जुटे तो यहाँ भी तकरीबन उतने ही लोग लेकिन मीडिया में यह मुद्दा उस समय सामने आया जब विषनगर के पाटीदारों ने अपने गुसैल स्वाभाव का परिचय देते हुए वहां के विधायक ऋषिकेश पटेल के दफ्तर पर हमला कर दिया। तब जाकर मीडिया का ध्यान इस और गया। अखबारों में इसकी थोड़ी बहुत चर्चा हुई। आरक्षण आंदोलन भी सबकी नज़रों में अाया और हार्दिक पटेल भी।

विषनगर की इस रैली के बाद तो जैसे तूफ़ान ही आ गया। जिला व तहसील स्तर  पर रोज छोटी छोटी रैलियां करके पाटीदारों को इकट्ठा करने का प्रयत्न किया गया। पटेलों की लगातार रैलियां होने लगीं और लगातार घोषणाएं भी सामने आने लगीं। जिसके बाद इन्होने सूरत में बड़ी रैली करनी की घोषणा की। जिसका मुख्य उद्देश्य सूरत व उसके आसपास के पाटीदारों का समर्थन हासिल करना था। 7 लाख के करीब पाटीदार सूरत में इकट्ठा हुए। ये सब रैलियां शांतिपूर्ण तरीके से हुयी, इसलिए इन रैलियों में जुटने वाली भीड़ ने पाटीदारों के हौसले को और बड़े पंख लगा दिए। इतनी संख्या में पाटीदारों को खुद के विरुद्ध खड़ा देखकर सरकार के पसीने भी छूटने लगे। जिस दिन सूरत रैली हुई, उसी दिन पटेल समुदाय के नेताओं को सरकार ने बातचीत का न्यौता दिया। किन्तु आनंदीबेन पटेल सरकार के लिए उनकी आरक्षण की मांग को स्वीकार कर लेना आसान नहीं है। इसलिए गुजरात सरकार ने भी कह दिया कि “अनामत तो नहींज मिले” मतलब “आरक्षण तो नहीं मिलेगा”।

सरकार के  इस इनकार से पटेलों ने अपने स्वर में आक्रोश भर लिया और उन्होंने उसके बाद यह घोषणा कर दी कि 25 अगस्त को अहमदाबाद में होने वाली महारैली से पहले सरकार से कोई बातचीत नहीं होगी। इस रैली में पहले से भी अधिक भीड़ जुटी। 10 लाख से भी ज्यादा पाटीदार इस रैली में शामिल हुए। जहाँ सब रैलियां शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुयी थी वहीँ इस रैली ने हिंसक रूप ले लिया। जिसमें 8 लोगों की जान भी चली गयी।

लेकिन क्या सरकार कि गलतियों को अनदेखा किया जा सकता है? या यूं कहा जा सकता है कि सरकार की कमियों की कहानी ही है पटेल आरक्षण आंदोलन? क्या गुजरात जातिवाद राजनीति में प्रवेश कर रहा है? लेकिन इसका जिम्मेदार कौन हैं? आरक्षण की आग को हवा देने में भाजपा का भी पूरा योगदान है। सत्ता में आने के बाद नरेन्द्र मोदी सरकार ने जाट आरक्षण तथा महाराष्ट्र में फड़नवीस सरकार ने  मराठा आरक्षण पर रूख तय करते हुए पूर्व कांग्रेस सरकारों के मजबूरी में उठाए गए क़दमों का कोर्ट में बचाव किया, जिस पर कोर्ट ने उन्हें कड़ी फटकार लगायी। लेकिन केंद्र अब तक इन समृद्ध तथा दबंग समुदायों को आरक्षण देने का समर्थन कर रहा है। तो फिर कैसे पटेल, ब्राह्मण तथा अन्य जातियां आरक्षण की मांग पर पीछे रह सकती हैं?

पटेलों के इतना बड़ा आंदोलन सरकार की कमियों की पोल खोलने के लिए काफी है। सरकार के पास बातचीत का पर्याप्त समय था। सरकार चाहती तो रणनीति भी बना सकती थी और पटेलों से बातचीत का दौर भी जारी रख सकती थी। लेकिन किसी ने कुछ न सोचा और ना किया, और दो टूक जवाब देकर इतने बड़े आंदोलन को जन्म दे दिया। सरकार के पास इस समस्या से निपटने की अपनी कोई तैयारी नहीं थी। सरकार केवल पाटीदारों की भीड़ से डरकर बौखला रही थी। करना क्या है, यह बिलकुल भी स्पष्ट नहीं था। सरकार की बोखलाहट पर पुलिस ने भी मुहर लगा दी। सरकार के बाद पुलिस ने भी अहमदाबाद रैली को हिंसक रूप लेने में अपना योगदान दे दिया।

सभी रैलियों की तरह अहमदाबाद रैली भी शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुई। सब लोग अपने घर को लौट रहे थे। जीएमडी मैदान पर जहाँ हार्दिक पटेल धरना दे रहे थे वहां केवल 4000 पाटीदार ही बचे थे, लेकिन पुलिस ने अपनी बौखलाहट का परिचय देते हुए वहां लाठीचार्ज कर दिया। यह खबर आग की तरह फैल गयी और पटेल समुदाय के जो लोग अभी घर भी नहीं पहुंचे थे, उन्होंने वही तोड़फोड़ शुरू कर दी। जहाँ से गुजरात में हिंसा ने जन्म ले लिया। रैली से पहले सरकार ने रैली में पहुँच रहे लोगों के टोल टैक्स ना देने तथा रैली के पुख्ता इंतज़ाम, सुरक्षा जैसी कई मांगों को मान लिया था तो फिर सरकार को इतनी जल्दी हार्दिक की धरपकड़ करने की क्या जरूरत आन पडी थी। देर रात तक गुज़रात की मुख्यमंत्री भी इस पर अपनी सफाई देती रही कि यह निर्णय पुलिस का है लेकिन तब किसको सुननी थी, हिंसा तो जन्म ले चुकी थी।

सरकार को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना होगा। उन्हें इस समस्या के निपटारे की रणनीति सुनिश्चित करनी होगी। उन्हें पटेल समुदाय के लोगों से लगातार बातचीत करनी होगी। आरक्षण मामले में सिद्दांतनिष्ठ और समरूप रवैया ना अपनाने के कारण ही गुजरात सरकार इस नयी राजनीतिक मुसीबत में फसी है। सरकार को यह समझना होगा कि पटेलों को आरक्षण देने से अन्य समाज भी इसके लिए सक्रिय होंगे। सरकार को अपनी गलतियों से सबक लेते हुए इस विषय पर आत्म-मंथन की आवश्यकता है। अब देखना यह है कि भाजपा और अन्य पार्टियां इससे कोई सबक लेंगी? गुजरात सरकार को पुलिस के रूख पर भी कार्यवाही सुनिश्चित करनी होगी ताकि पाटीदारों से बातचीत के दौरान पुलिस के इस रवैये पर अपना पक्ष रख सके।

राजनीति, प्रतिद्वंद्वी बनकर कीजिये दुश्मन बनकर नहीं

राजनीति एक ऐसा विशाल सागर है जिसमें छोटे बड़े राजनेता अपने प्रतिद्वन्द्वियों को हराकर सत्ता अपने हाथ में रखना चाहते हैं। राजनीतिक लिहाज़ से भले ही उनमें कई मतभेद हों लेकिन निजी तौर पर उनमें मनमुटाव नहीं होता। लेकिन भारत की मौजूदा राजनीति इसके बिलकुल विपरीत है। नरेंद्र मोदी बनाम सोनिया गांधी इसी बात का सबसे माकूल उदाहरण है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच मनमुटाव अब तक राजनीतिक रैलियों में ही नजर आता था लेकिन अब तो संसद में भी इस मनमुटाव ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है। इन दोनों राजनीतिक दिग्गजों का किसी भी बात पर आपस में असहमति जताना इस बात की पुष्टि करता है कि यह अनबन केवल राजनीतिक नहीं है बल्कि इसके पीछे कोई निजी कारण है।

हाल ही में मानसून का बर्बाद हुआ सत्र भी इसी बात की और इशारा करता है कि यह केवल पक्ष बनाम विपक्ष अथवा कांग्रेस बनाम भाजपा वाली राजनीती का नतीजा नहीं है, बल्कि यह ऐसे राजनेताओं के मनमुटाव का प्रतिफल है जो एक दूसरे को कतई पसंद नहीं करते हैं। इन दोनों के झगडे को देखकर तो ऐसा ही लगता है कि ये दोनों राजनेता एक दूसरे को राजनीतिक रूप से खत्म करने पर तुले हैं। यही कारण है कि ये दोनों दिग्गज राजनेता ना तो किसी मुद्दे पर सहमत होते हैं और ना ही आपस में कोई कामकाजी रिश्ता विकसित कर पाते हैं, भले ही उसमें जनता का हित ही क्यों ना हो। मानसून सत्र में देश को जो नुकसान हुआ, मोदी बनाम सोनिया उसका एकमात्र कारण है। इन दोनों की जिद के कारण ही संसद में लगातार गतिरोध की  परिस्थिति बनी रही।

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हालांकि राजनीति में ऐसा मनमुटाव पहली बार देखने को नहीं मिला। राज्य विधानसभाओं में ऐसा पहले भी देखा जा चुका है।  मायावती बनाम मुलायम सिंह यादव, जयललिता बनाम करूणानिधि तथा और भी ऐसे कई किस्से है जिनमें राजनीति के दिग्गजों में निजी मतभेद देखा गया है। मोदी और सोनिया की इस दुश्मनी का लंबा इतिहास रहा है। वर्ष 2007 के गुजरात चुनाव में सोनिया ने 2002 के दंगों को तूल देकर मोदी पर “मौत का सौदागर” होने की टिप्पणी कर दी थी। लेकिन नरेंद्र मोदी ने भी इसके बदले में कोई कसर नहीं छोड़ी। 2002 में उन्होंने सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को उठाकर आसान जीत दर्ज की थी। कुछ वर्ष पहले भी मोदी  ने कांग्रेस नेता को अपमानजनक ढंग से सम्बोधित किया था। इन दोनों का एक दूसरे के प्रति रवैया केवल राजनीतिक मतभेद तो नहीं हो सकता। इन दोनों की यह लड़ाई चुनावी हार जीत से बहुत परे चली गयी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषणों में कई बार कांग्रेस मुक्त भारत की बात की है। इससे इस बात को तो साफ़ तौर पर पर देखा जा सकता है कि वे कांग्रेस को केवल पराजित ही नहीं करना चाहते हैं बल्कि खत्म कर देना चाहते हैं। आरएसएस पृष्ठभूमि से जुड़े होने के कारण भी मोदी हमेशा से ही जवाहरलाल नेहरू को नापसंद करते आये हैं। इसकी झलक उनके भाषणों में साफ दिखाई देती है। उन्होंने अपने भाषणों में नेहरू के योगदान को कभी महत्त्व नहीं दिया, जबकि सरदार पटेल, सुभाष चन्द्र बोस, लाल बहादुर शास्त्री तथा महात्मा गांधी का गुणगान करते उन्हें कई बार देखा गया है। उनके भाषणों से ऐसा लगता है मानो मोदी नेहरूवादी विरासत को देश की राजनीति से हमेशा के लिए मिटा देना चाहते हों। लेकिन वे ये बात भी भूल रहे हैं कि किसी की राजनीतिक विरासत को ख़त्म कर देना भाषण देने जितना आसान काम नहीं है।

नरेंद्र मोदी भले ही जवाहरलाल नेहरू को पसंद ना करते हों लेकिन इस बात को झुठला नहीं सकते की देश का पहला प्रधानमंत्री होने का गौरव उन्हें ही प्राप्त है और राजनीति में उनके योगदान भाषणों में उनका नाम न लेने से कम नहीं होगा। इसलिए उनके नाम को देश की राजनीति से मिटाना समझदारी का नहीं अपितु द्वेष का प्रमाण होगा। सोनिया गांधी ने भी समय रहते शायद इसे भांप लिया है, तभी तो अचानक कांग्रेस की कमान अपने हाथों में ले ली है, साथ ही पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भरते हुए उन्हें मोदी से ना डरने के लिए प्रेरित भी करती नज़र आ रही हैं। संसद में मानसून सत्र के दौरान उनका आक्रोश भरा रूख इस बात की पुष्टि करता है। उनके सख्त रवैये ने इस बात को तो साफ़ बता दिया कि खुद के संरक्षण तथा परिवार की विरासत बचने के लिए वे कुछ भी कर सकती हैं। मोदी को कड़ी चुनौती देने के लिए इसीलिए सोनिया गांधी बार बार मोदी की धर्मनिरपेक्षता को कटघरे में खड़ा कर देती है। आरएसएस से जुड़े होने के कारण मोदी को भी इस पर मौन रहना पड़ता है।

मनमुटाव की वजह कोई भी हो। दलील कोई भी दी जा सकती है। चाहे मोदी, सोनिया गांधी के विदेशी मूल की होने की अपनी नफरत को पचा नहीं पा रहे हो या दूसरी तरफ सोनिया गांधी मोदी के प्रधानमंत्री बनने को अभी तक स्वीकार नहीं कर पायी हो। असलियत यही है कि 2002  से चली आ रही इस लड़ाई में देश का बहुत नुकसान हो चुका है। नरेंद्र मोदी अब बहुमत दल कि सरकार के प्रधानमंत्री है तथा सोनिया गांधी सबसे बड़े विपक्ष दल कि अध्यक्ष। दोनों को राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बनकर काम करना होगा दुश्मन बनकर नहीं। दोनों देश कि राजनीति में महत्वपूर्ण रुतबा रखते हैं। इसलिए दोनों को एक दूसरे से व्यवहार करना आना चाहिए। एक दूसरे के प्रति लगातार मनमुटाव उत्पन्न करके संसदीय व्यवस्था को शर्मसार करने कि बजाये मिलकर देश कि राजनीति में अपना योगदान दें, जिससे देश नुकसान से भी बच जाएगा और जनता के हित के बारे में भी सोचा जा सकेगा।

नमो की विदेश नीति कितनी सफल?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी(नमो) ने अपने विदेशी दौरों का सिलसिला अभी तक जारी ही रखा है। इसके पीछे उनका उद्देश्य दूसरे देशों द्वारा भारत में निवेश करवाना या निवेश को पहले से अधिक बढ़ाना है। उनकी इस कोशिश से भारत विश्व में अंतराष्ट्रीय बाजार के तौर पर अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है। नमो की विदेश यात्राओं ने एक तरफ जहाँ भारत को विश्व में अलग पहचान दिलाई है वहीँ विश्व भर के निवेशकों को भारत की तरफ आकर्षित भी किया है। इसके लिए उन्होंने चुना भी उन देशों को है जो पिछली सरकारों की प्राथमिकता सूची में या तो कभी आये ही नहीं या फिर सूची में उनका स्थान बहुत नीचे था। प्रधानमंत्री ने अपने विदेशी दौरों द्वारा उन देशों से समन्वय स्थापित करने का प्रयत्न किया है जिन्होंने भारतीय बाजार में कभी निवेश करने पर शायद विचार तक भी ना किया हो।

प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं का समझदारी से अध्ययन किया जाये तो कुछ महत्वपूर्ण बातें है जो निकल कर सामने आती हैं। अपनी यात्राओं को उन्होंने सबसे अधिक विदेशी निवेश को आकर्षित करने पर केंद्रित रखा है। विदेश में रहने वाले भारतीयों/भारतीय मूल के नागरिकों में नया उत्साह भर दिया है। नमो ने उन्हें इस बात का भरोसा दिलाया है कि विश्व भर में बसे भारतीय हमारे देश का अभिन्न अंग हैं। वो हमारे थे और सदा रहेंगे। मोदी ने भारतीय मूल के लोगों को यह भरोसा दिलाया है कि हम ना तो उन्हें भूले हैं और ना कभी भूलेंगे। यही सब बातें उनकी संयुक्त अरब अमीरात(यूएई) की यात्रा में भी देखने को मिली। यूएई 1971 में अपने गठन के बाद से ही भारतियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। यही वजह है कि वहां की तकरीबन 94 लाख जनसंख्या में करीब 24 लाख लोग भारतीय मूल के हैं। इसके  बावजूद पिछली सरकारों में इंदिरा गांधी के बाद नरेंद्र मोदी ही केवल ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने संयुक्त अरब अमीरात का दौरा किया है। इंदिरा गांधी 1981 में यूएई आयीं थी। इसलिए मोदी ने भी मौके को खूब संभाला तथा यह बोलकर वहां के लोगों का दिल जीत लिया कि “वो 34 वर्षों की कमी को पूरा करने आये हैं”।

भले ही अपने भाषण में नमो ने वहां रह रहे भारतीयों की तारीफ के पुल बांधे हों लेकिन उनका लक्ष्य निवेशकों को लुभाना ही रहा। उन्होंने निवेशकों को यह भरोसा भी दिलाया कि भारत में तुरंत एक ख़राब डॉलर के निवेश के अवसर हैं। साथ ही उन्होंने इस बात का भरोसा भी दिलाया कि भारतीय बाजार में पैसा लगाना उनके लिए फायदे का सौदा ही होगा। प्रधानमंत्री ने निवेशकों का ध्यान इस और भी दिलाया कि अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक तथा क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज जैसे संस्थानों के अनुसार भारत विश्व की सबसे तेज बढ़ रही अर्थव्यवस्था है, जहाँ पैसा निवेश करने पर केवल मुनाफ़ा ही होगा। यूएई में मौजूद भारतीयों की तारीफ करते हुए नमो ने यह कहा कि भारतीयों ने यहाँ अपने श्रम और क्षमताओं का परचम पहले ही लहरा रखा है। मोदी ने अपने भाषण से वहां के लोगों का दिल इस प्रकार जीता कि उन पर यकीन करना किसी के लिए भी कठिन नहीं रहा होगा। अब नमो की विदेश नीति कितनी सफल होती है ये तो वक्त ही बताएगा, किन्तु उन्होंने वहां के लोगों में भारत में निवेश के प्रति विश्वास जरूर जगा दिया। यूएई के निवेशक भारत में कितना तथा किस प्रकार निवेश करते हैं यह काफी कुछ देश के अंदरूनी माहौल पर निर्भर करता है। फ़िलहाल तो केवल यही आशा की जा सकती है कि प्रधानमंत्री की विदेश नीति देश को विकास के मार्ग पर ले जाने में सहायक सिद्द होगी।

स्वतंत्रता दिवस पर विशेष- आज़ादी के मायने

तमाम तरह की सजावट से लैस दिल्ली का लाल किला जहाँ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तिरंगा फहराकर देश को सम्बोधित किया। लाल किले के प्राचीर से यह उनका दूसरा सम्बोधन था। बच्चों में अपने प्रधानमंत्री से बात करने का उत्साह लाल किले पर आज देखा जा सकता था। मोदी जी से मिलने की खुशी से यह साफ़ जाहिर हो रहा था कि मानो बच्चों को प्रधानमंत्री से न जाने कितनी उम्मीदें हैं। और ऐसा होना भी चाहिए। देश के भविष्य को अपने देश के प्रधानमंत्री से उम्मीदें होनी जायज है। किन्तु जिस उज्जवल भारत के सपने ये छोटे-छोटे बच्चे देख रहे हैं उसे पूरा करने के लिए मौजूदा सरकार तत्पर भी है या फिर उम्मीदों के सपने देखकर ये बच्चे स्वयं के साथ ही धोखा कर रहे हैं। आज लाल किले पर सब कुछ वैसा ही हुआ जैसा एक वर्ष पूर्व हुआ था। ऐसा लग रहा था मानो सब कुछ एक कागज़ पर लिखा गया हो और उसे क्रमवार दोहराया जा रहा हो। प्रधानमंत्री का तिरंगा फहराना, उमीदों से भरा भाषण, बच्चों से मिलकर उनमें उत्साह भरना आदि सब पहले जैसा ही था।

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आजादी के दिन को पूरे देश में बहुत धूमधाम से मनाया जा रहा है। खासकर सरकार 15 अगस्त के इस दिन के लिए विशेष तैयारियों में जुटी नज़र आयी। स्कूलों, सरकारी संस्थानों, महाविद्यालयों, विश्विद्यालयों आदि में हर जगह तिरंगा लहराया नज़र आया। कहीं देश में “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” अभियान के अंतर्गत बेटियों से ही तिरंगा फहराया गया। क्या तिरंगे की शान में चार चाँद लगाने के लिए केवल एक ही दिन है, 15 अगस्त का? यदि सरकारें आजादी न मनाये तो क्या देश में इस दिन का इतना उत्साह देखने मिल सकता है? सच माने तो ऐसा नहीं होगा। देश इस समय इतना गरीबी, सुरक्षा, महंगाई से परेशान नहीं है जितना इस देश की सरकारों से है। देश के लोगों के पैसों पर भारी सुरक्षा के साथ बड़ी बड़ी गाड़ियों में घूमने वाले नेताओं की क्या यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि वो अपने निजी झगड़ों से हटकर देश के हित के लिए एक साथ आगे आएं। क्या पिछले दिनों मानसून सत्र में संसद में मचे हंगामे से देश वाकिफ नहीं है? बेवजह अपनी लड़ाई और जिद को जनता के हित में सही बताने का अधिकार है उन्हें? संसद में काम में अवरोध उत्पन्न करके जिस पैसे की बर्बादी की जा रही है वो उनकी जेब से खर्च हो रहे हैं? लेकिन इन सरकारों ने देश का जो हाल इस समय बना रखा है, उसके हल के लिए कोई प्रयास होते हीं दिखते। ऐसे में देश की जनता क्या करे? एक सरकार ने उम्मीदें तोड़ी तो दूसरी सरकार को मौका दिया, लेकिन उनके सिपेसालार ने तो साल भर में विदेश यात्राओं की ऐसी झड़ी लगाई कि देश के लोगों के लिए प्रधानमंत्री के दर्शन करने ही दुर्लभ हो गए।

कहने को हम आजाद हैं लेकिन यह आज़ादी केवल कागज़ों में ही सीमित नहीं रह गयी है? सोशियल मीडिया, अखबारों में, टीवी चैनलों पर स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें जोरों शोरो से दी जा रही हैं। लेकिन लगता तो ऐसा है कि आजादी केवल देश के राजनेताओं तक ही सीमित रह गयी है। कुछ भी बोलने की आज़ादी। एक दूसरे पर कीचड उछालने की आज़ादी। संसद में हंगामा करने की आज़ादी। बाकी सब तो आज भी गुलाम ही हैं। गरीब महंगाई का गुलाम है तो किसान कर्ज की ज़ंजीरों तले दबा है। कहीं देश प्रकृति का कहर झेल रहा है तो देश की सीमा पर खड़े जवान दिन रात गोलाबारी का सामना करके शहीद हो रहे हैं। ऐसे में आज़ादी के मायने समझना बहुत मुश्किल हो गया है। सरकारें तो देश की आज़ादी का उत्सव मना रही हैं लेकिन देश की सीमा पर गोलाबारी का सामना करने वाले जवानों को शायद आज की तारीख भी याद ना हो। उन्हें तो केवल अपनी भारत माता की रक्षा करना और उसके लिए मर मिटना ही याद है।

मेरे लिए तो देश की आजादी के इस दिन के कोई मायने रह ही नहीं जाते, जब देश के जवान इस दिन पर मिठाइयां तक नहीं बाँट पाते। जिन पर देश की सुरक्षा का जिम्मा है ताकि देश के लोग आज़ादी को खुलकर जी सकें, यदि वो ही उदास हैं तो क्या मायने निकलते हैं इस आज़ादी के? क्या उन देश वासियों को इस आज़ादी के सुख का मजा लेने का कोई अधिकार नहीं है जिनके परिवार का कोई न कोई सदस्य देश की सीमा पर तैनात है?  इस सबके बावजूद देश की सरकार कोई सख्त रूख अपनाने की बजाये दुश्मन देश की तरफ बातचीत का हाथ बढ़ा देती है जिसे वह हर बार ठुकरा देते हैं। देश में लगातार हमले हो रहे हैं। देश की शांती को भंग करने का निरंतर प्रयास जारी है। देश में हर तरफ चिंताजनक माहौल है और बात करते हैं आज़ादी  की। आखिर क्यों सबकुछ लाचार सा प्रतीत होता है? आज भी आज़ादी के मायने बिलकुल भी नहीं बदले हैं जिनसे हमारा देश आज आजादी के 68 साल बाद गुज़र रहा है। बल्कि अधिक खतरनाक हो चले हैं। ऐसा लगता है मानो पूरी आजादी सिमट कर समस्याओं के कब्जे में आ गई हों और छटपटाती हुई अपनी प्राण रक्षा के लिए पुकारती हो।

क्या कोई स्पष्ट रूप से बता सकता है कि आखिर हम आज़ाद हैं क्यों? आखिर होती क्या है ये आज़ादी? इसे हम त्यौहार की तरह क्यों मनाएं? क्या राजनेताओं के सिवा कोई और भी जानता है इसका अर्थ? लाल किले के प्राचीर से हुई लुभावनी घोषणाएं जनता के लिए इतनी मायने नहीं रखती जितनी सत्ताधारियों के लिए रखती है। सत्ता आपके पास है। बहुमत आपके पास है। जनता आपकी है और आपको टकटकी लगाए देख रही है। सबकुछ तो है फिर कौनसी वजह है कि इन डेढ़ वर्षो में जमीनी स्तर पर नतीजे  में सिर्फ बाबा जी का ठुल्लु ही हाथ लगा है। सीमापार बैठे लोग रोज आपको धमकिया दे रहे हैं। एक शांती का दुश्मन देश आपकी छाती पर मूंग दल रहा है।आपकी भारत माता के शीश कश्मीर को अपने पंजे में लेकर नोचने खरोंचने का प्रयत्न करता है। फिर क्या वजहें हैं कि अलगाववादियों की ताकत आपकी ताकत से अधिक जान पड़ रही है। वो भी तब जब आप दिल्ली में बैठे ही इस इरादे से थे कि आप कश्मीर को अपना हिस्सा और आतंकवाद को ख़त्म कर देंगे. तब आखिर क्या कारण है कि आतंकवाद के मामले पर आप अपना पक्ष मजबूती से रख ही नहीं पा रहे?

फिर भी देशवासियों के पास फिलहाल आपसे उम्मीदें लगाए रखने की जगह कोई विकल्प नहीं है। आपको समय दिया है तो उस समय का सदुपयोग करने की जरूरत को समझिए। क्योंकि बदलाव और अच्छे दिन की आस नई सरकार पर विश्वास के कारण है। इस विश्वास को न सिर्फ बनाए रखने बल्कि उसे साकार करने की जरूरत है। आज़ादी केवल कागज़ों की रौनक ना बढाए बल्कि देशवासियों के दिल में उमंग और उत्साह भर दे। आज़ादी के इस दिन यही कामना है कि लालकिले से जो घोषणाएं की गयी है वो सत्यता में परिवर्र्तित हो जाएं. और खुशी और आज़ादी का असली माहौल देश में दिखाई दे।

अपने धर्म को भूल रहा है मीडिया

आज के समय में राजनीती और बांटना शायद एक सिक्के के दो पहलुओं की तरह एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। आज के दौर के हिसाब से देखा जाए तो राजनीती का छिपा हुआ अर्थ ही बांटना है या यूँ कह लीजिये की बांटने को ही आज के समय की राजनीती कहते हैं। यह मान लेना कतई गलत नहीं होगा कि राजनीती का तो काम ही बांटने का है और अगर वे बांटेंगे नहीं तो अपनी कुर्सियों को ज्यादा समय तक बचा के नहीं रख पाएंगे। देखा जाये तो हैदराबाद के ओवैसी से लेकर दिग्विजय सिंह, शशि थरूर सबको याकूब के मुदद्दे पर हंगामा मचाने के लिए क्षमादान दिया जा सकता है क्यूंकि वो सब तो अपने आज के राजनीती धर्म का पालन कर रहे थे। देश पर अपना शासन अथवा प्रभुत्व जमाने के लिए ऐसा करने की प्रेरणा शायद उन्होंने अंग्रेजों के प्रसिद्द नारे “फूट डालो और राज़ करो” से ली है। राजनीति का तो काम ही लोगों को बांटना है लेकिन मीडिया को कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है, जिसने देश के सामने सत्यता को प्रकट करने की शपथ ले रखी है। लगभग एक सप्ताह पहले मीडिया ने देश के लोगों को धर्म के नाम पर बांटने में खूब बड़ी भूमिका अदा की। अपने जान-जागरण के संकल्प को भूलकर मीडिया ने अपने चैनलों की टीआरपी बढ़ाने में अपना पूरा जोर लगा दिया। भले ही उससे देश के भीतर कैसा भी माहौल क्यों ना पैदा हो।

12 मार्च 1993 को खून से लथपथ वो मंजर कभी भुलाया नहीं जा सकता, जिसने ना जाने कितने ही घरों के चिराग भुजा दिए, कितनो को यतीम और बेऔलाद कर दिया। जिस मामले में याकूब मेमन को फांसी हुई वो हमारे लिए विवाद का विषय है। जिस मामले में इस आतंकवादी को फांसी की सज़ा हुई उस खौफनाक हादसे के दिन मुंबई शहर के सेंचुरी बाजार की ही घटना पर गौर कर ले तो आपकी आत्मा कांप जाएगी कि वहां याकूब मेमन और उसके साथियों ने इस बात की रैकी(जांच) की थी कि धमाका करने के लिए किस जगह पर बारूद भरा जाए ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग मारे जा सकें। याकूब ने बाजार के मैनहोल में विस्फोटक भरवाया था, जिसके ऊपर से स्कूल बस के गुजरते ही बम फटा था। सिर्फ इसी जगह पर मरने वालों में 100 से अधिक बच्चे, महिलाएं तथा कुछ बुजुर्ग भी थे। लेकिन मीडिया और राजनीति इस मामले पर भी आपस में बंटी हुई नज़र आई।

याकूब मेमन की फांसी की खबर को, हमारे देश का सम्मान कहे जाने वाले हमारे राष्ट्रपुरुष वैज्ञानिक डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की खबर से ज्यादा तवज्जो देकर टेलिसीजन मीडिया ने जिस प्रकार देशवासियों के भावनाओं का अपमान किया है, वो माफ़ी के काबिल नहीं है। देश की प्रिंट मीडिया ने तो सयम दिखाकर कैसे न कैसे अपनी साख बचा ली लेकिन टेलीविजन मीडिया ने तो बेशर्मी की सारी हदें ही पार कर दी। असदुद्दीन ओवैसी जो उस हत्यारे आतंकवादी को बचाने के लिए मुसलामानों को हिन्दुओं के खिलाफ भड़का रहा था, उसे तो ये चैनल वाले लाइव दिखाते रहे और देश के महान वैज्ञानिक जो देशवासियों को हमेशा के लिए अलविदा कह चले थे उनके लिए मीडिया के पास बिलकुल भी समय नहीं था? क्या  क्या मीडिया केवल सनसनी फैलाने को ही अपना सामजिक दायित्व समझती है? आतकवाद के खिलाफ लड़ना क्या सिर्फ सराकरों, सेना और देश के लोगों की ही जिम्मेदारी है ? क्या मीडिया की इसमें कोई भूमिका नहीं हो सकती? अगर हो सकती है तो मीडिया का दायित्व नहीं बनता था कि वो आतंकवादियों के पक्ष में भोंकने वाले लोगों को ना दिखाकर उन परिवारों के लोगों से बात करे जिन्होंने 1993 में अपना सब कुछ खो दिया था। क्या मीडिया का यह जानना फर्ज नहीं बनता था कि याकूब की फांसी ने पीड़ितों के जख्मों पर किस कद्र मरहम लगाने का काम किया है?

लेकिन देश का चौथा स्तम्भ कहे जाने वाली मीडिया के पास पीड़ितों के मन का हाल जानने का समय कहाँ था। उन्हें तो देश में सनसनी फैलाने का महत्वपूर्ण कार्य जो करना था। आखिर यह कैसी पत्रकारिता है जिसके संदेशों से यह ध्वनित हो रहा है कि हिन्दुस्तान के मुसलमान एक आतंकी की मौत पर दुखी हैं? क्या इससे दो धर्मों के लोगों में रिश्तेेे कमजोर नहीं होंगे? आतंकी के मुसलामानों से तुलना करना क्या हिन्दुस्तान के बाकी मुसलमानों के साथ अन्याय नहीं होगा? मेरी ऐसा मानना है कि हिन्दुस्तान का मुसलमान किसी हिन्दू से कम देशभक्त नहीं है। लेकिन ओवैसी जैसे लोगों को मुस्लिमों का प्रतिनिधी मानकर उसके विचारों को सारे मुसलामानों के राय मान लेना क्या मुसलामानों के साथ अन्याय नहीं होगा? लेकिन मीडिया ने वोट की राजनीती करने वाले ओवैसी की निराधार बयानबाजी को ज्यादा हवा देकर अपनी नासमझी का प्रमाण दिया है। आखिर क्यों मीडिया भारतीय मुसलामानों को अलग नजर से देखती है? क्या आतंकवादी गतिविधियों में केवल हिन्दू ही मारे जाते हैं मुसलमान नहीं?

दोनों कौमों की लड़ाई सामान ही है। दोनों के सुख-दुःख एक ही हैं। आतंकवाद का जितना प्रभाव हिन्दुओं पर पड़ता है उतना ही मुसलामानों या अन्य धर्म के लोगों पर भी पड़ता है। दोनों के सामने बेरोजगारी, गरीबी, महंगाई मुँह फाड़े खड़ी है। वे भी दंगों में मरते और मारे जाते हैं। बम उनके बच्चों को भी अनाथ बनाते हैं। तो फिर मीडिया को क्या जरूरत पडी है कि वो उनको अलग अलग नज़र से देखकर दोनों का बांटने का काम करे? देश की अदालतें जाति या धर्म देखकर फैसले करती हैं, यह कहना तो बिलकुल ही गलत है। फांसी दी जाए या न दी जाए इसके पहलुओं पर विचार करना बेहद आवश्यक है, किन्तु जब तक हमारे देश में यह सजा मौजूद है तब तक किसी की फांसी को साम्प्रदायिक रंग देना कहां की समझदारी है? दिग्विजय सिंह और शशि थरूर तब कहां थे जब कांग्रेस के कार्यकाल में फांसी हुई थी? इसलिए देश की एकता और अखंडता को ठेस पहुंचाने वाले की सज़ा के विरुद्ध खड़े होना, देश के सर्वोच्च न्यायालय तथा महामहीेम राष्ट्रपति के विवेक पर संदेह करना अपने आप में एक अपराध ही है।

डा. कलाम ने एक बार मीडिया विद्यार्थियों को शपथ दिलाते हुए कहा था, ‘‘मैं मीडिया के माध्यम से अपने देश के बारे में अच्छी खबरों को बढ़ावा दूंगा, चाहे वे कहीं से भी संबंधित हों। क्या मीडिया कलाम  साहब को दिए इस वचन को निभा रही है? देश की धर्मनिरपेक्षता का नारा “हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख-ईसाई आपस में सब भाई भाई”, सुनने में और पढ़ने में तो बहुत अच्छा लगता है किन्तु क्या सच में हम इस नारे का सम्मान कर पा रहे हैं? हम बंटे हुए लोग इस देश को कैसे एक रख पाएंगे? सभी धर्म के लोगों में दरार पैदा करने वाली राजनीति हो रही है और मीडिया भी इसे अपने चैनलों पर खूब उछाल रहा है। क्या ऐसा करना सही है? मीडिया अपने धर्म को भूल रही है। मीडिया को आखिर ये अधिकार किसने दिया कि वह ऐसी बयानबाजियों को दिखाए जिससे देश का माहौल बिगड़ सकता है। मीडिया को यह समझना होगा कि उसका काम बहुत ही जिम्मेदारी वाला काम है। मीडिया को आखिर यह कौन समझाएगा कि भारतीय हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों के नायक भारतरत्न कलाम हैं न कि कोई आतंकवादी. मीडिया आतंकवाद को खत्म करने में बहुत बड़ी भूमिका निभा सकता है. बस जरूरत है तो सत्यता, निष्पक्षता और ईमानदारी से काम करने की।

संसदीय गतिरोध पर सांसदों के निलंबन को नियम का रूप ले लेना चाहिए

संसद की कार्यवाही में लगातार रुकावट पैदा होने से जनता में निराशा और लाचारी की भावना पनप रही है।  संसदीय गतिरोध ने जनता को ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या संसद में मौजूद अलग-अलग पार्टियों के नेता देश के मुद्दों पर लड़ रहे हैं या अपने निजी राजनीतिक मसलों के लिए।  संसद में मूर्खों की तरह लड़ते झगड़ते हुए देश के नेताओं को देखकर जनता को यह तो एहसास हो ही गया है कि उन्होंने इन लोगों को संसद तक पहुंचाकर बहुत बड़ी भूल कर दी है।  ऐसा प्रतीत होता है मानो ये संसद में केवल एक दुसरे की पार्टी पर कीचड उछलने के लिए ही जाते हैं।  देश में क्या घट रहा है, देश किन-किन समस्यायों से झूझ रहा है, इससे इन्हें कोई लेना देना ही नहीं है।  देश में कहीं आतंकवादी घुसपैठ कर जाते हैं तो कहीं सीमा पर खड़े देश के जवान देश के लिए शहीद हो जाते हैं. कही बाढ़ की स्थिति है तो कहीं महामारी की, इस बात से तो जैसे इन्हें कोई फर्क ही नहीं पढता।  बावजूद इसके प्रत्येक पार्टीे अपने आप को देश की सबसे बड़ी हिमायती होने का दावा करने से पीछे नहीं हटती।

सोमवार को बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में संसदीय गतिरोध पर बातचीत का क्या नतीजा होना था, ये तो जनता को पहले से ही ज्ञात था।  लेकिन कांग्रेस की संसदीय दाल के बैठक में सोनिया गांधी ने संसदीय गतिरोध की समस्या को सुलझाने की बजाए और अधिक उलझाने के संकेत अवश्य दे दिए।  सोनिया गांधी ने गुस्सैल रूख अपनाकर ये तो साफ़ कर दिया कि संसद की कार्यवाही इतनी आसानी से नहीं चलने देगी।  उनके इसी रवैये ने लोकसभा स्पीकर को संसद के नियम 374 का इस्तेमाल करने पर मजबूर कर दिया।  इस नियम के तहत लोकसभा स्पीकर संसदीय कार्यवाही में रुकावट पैदा करने वालों को संसद से निलंबित कर सकते हैं।  इसी नियम के अनुसार ही स्पीकर सुमित्रा महाजन ने कांग्रेस के 25 सदस्यों को 5 दिन के लिए संसद से बाहर का रास्ता दिखा दिया।  लोकसभा स्पीकर ने इन सदस्यों को संसद में गतिरोध उत्पन्न करने के सन्दर्भ में पहले ही चेतावनी दी थी जिसे कांग्रेस के सदस्यों ने नजरअंदाज कर दिया।  अब संसद में सत्तापक्ष और विपक्ष में बातचीत के कोई आसार नजर नहीं आते हैं।  देश की जनता का दुर्भाग्य है कि उन्हें मानसून  सत्र में देश के हित में कुछ भी होता हुआ नजर नहीं आ रहा है।

लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन  के सख्त रूख अपनाने से विपक्ष और भी अधिक तिलमिला उठा है।  अब वो अन्य राजनीतिक दल भी सुमित्रा महाजन के इस रवैये का विरोध कर रहे हैं जो “इस्तीफा नहीं तो काम नहीं” के कांग्रेस के नारे के खिलाफ थे।  कांग्रेस सरकार को संसद की कार्यवाही को आगे बढ़ाने से ज्यादा दिलचस्पी आईपीएल के पूर्व चेयरमैन ललित मोदी से जुड़े केस में घिरी सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे तथा व्यापम घोटाले के कारण मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का इस्तीफा लेने में है।  कांग्रेस इन सब के इस्तीफे पर अड़ी  है।  इसलिए ही कांग्रेस ने इस नारे को जनम दिया है कि “इस्तीफा नहीं तो काम नहीं”।  स्पीकर के कड़े रूख को लेकर विपक्षी पार्टियों का भी संसद में एकमत नहीं है।  जहां वामदलों और जनता दल (यू) ने इसका समर्थन किया वहीँ तृणमूल कांग्रेस ने इसे संसदीय परम्परा के विरुद्ध बताया।  इसी विरोध के साथ ही तृणमूल कांग्रेस ने अगले 5 दिन तक संसद का बहिष्कार करने का निर्णय भी सुना डाला।  सोनिया गांधी ने कहा था कि “कल के हंगामेबाज आज बहस आर विचार-विमर्श के समर्थक बन गए हैं”।  लेकिन अब यही बात कांग्रेस के लिए बोली जाये तो कहा जा सकता है कि “कल के बहस के हिमायती आज हंगामेबाज़ बन गए हैं”।

यदि निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो सुमित्रा महाजन का यह कदम उचित है।  लोकसभा में दुर्व्यवहार सभी को शर्मिन्दा करता है. ऐसा होना ही नहीं चाहिए कि नौबत यहाँ तक आ जाये। कांग्रेस सांसदों का निलंबन नियमों के लिहाज से जायज है।  अब इसे स्थायी नियम का रूप ले लेना चाहिए।  चाहे कोई भी हो सत्तापक्ष या विपक्ष।  संसद का अपमान करने वालो तथा ससदीय कार्यवाही में खलल उत्पन्न करने वालों पर कार्यवाही होनी ही चाहिए। सवाल यह उठता है कि पिछले कुछ समय से संसद में जो संसदीय कार्यवाही का विरोध करने की परम्परा बन रही है, उसके रहते क्या देश के हित में कोई भी निर्णय लेना संभव होगा? जनता को तो नहीं लगता।  अब इसका हल तो सभी दलों को पुनर्विचार करके ही निकालना होगा।  उन्हें समझना होगा कि जनता ने उन्हें राष्ट्र हित में कार्य करने के लिए चुना है, ना कि अपने राजनीतिक स्वार्थ को पूरा करने के लिए।  देश की आम जनता निराश है लेकिन अभी भी उम्मीद भरी नजरों से संसद की तरफ देख रही है।  इसका सम्मान करना ही होगा.