नमो की विदेश नीति कितनी सफल?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी(नमो) ने अपने विदेशी दौरों का सिलसिला अभी तक जारी ही रखा है। इसके पीछे उनका उद्देश्य दूसरे देशों द्वारा भारत में निवेश करवाना या निवेश को पहले से अधिक बढ़ाना है। उनकी इस कोशिश से भारत विश्व में अंतराष्ट्रीय बाजार के तौर पर अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है। नमो की विदेश यात्राओं ने एक तरफ जहाँ भारत को विश्व में अलग पहचान दिलाई है वहीँ विश्व भर के निवेशकों को भारत की तरफ आकर्षित भी किया है। इसके लिए उन्होंने चुना भी उन देशों को है जो पिछली सरकारों की प्राथमिकता सूची में या तो कभी आये ही नहीं या फिर सूची में उनका स्थान बहुत नीचे था। प्रधानमंत्री ने अपने विदेशी दौरों द्वारा उन देशों से समन्वय स्थापित करने का प्रयत्न किया है जिन्होंने भारतीय बाजार में कभी निवेश करने पर शायद विचार तक भी ना किया हो।

प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं का समझदारी से अध्ययन किया जाये तो कुछ महत्वपूर्ण बातें है जो निकल कर सामने आती हैं। अपनी यात्राओं को उन्होंने सबसे अधिक विदेशी निवेश को आकर्षित करने पर केंद्रित रखा है। विदेश में रहने वाले भारतीयों/भारतीय मूल के नागरिकों में नया उत्साह भर दिया है। नमो ने उन्हें इस बात का भरोसा दिलाया है कि विश्व भर में बसे भारतीय हमारे देश का अभिन्न अंग हैं। वो हमारे थे और सदा रहेंगे। मोदी ने भारतीय मूल के लोगों को यह भरोसा दिलाया है कि हम ना तो उन्हें भूले हैं और ना कभी भूलेंगे। यही सब बातें उनकी संयुक्त अरब अमीरात(यूएई) की यात्रा में भी देखने को मिली। यूएई 1971 में अपने गठन के बाद से ही भारतियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। यही वजह है कि वहां की तकरीबन 94 लाख जनसंख्या में करीब 24 लाख लोग भारतीय मूल के हैं। इसके  बावजूद पिछली सरकारों में इंदिरा गांधी के बाद नरेंद्र मोदी ही केवल ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने संयुक्त अरब अमीरात का दौरा किया है। इंदिरा गांधी 1981 में यूएई आयीं थी। इसलिए मोदी ने भी मौके को खूब संभाला तथा यह बोलकर वहां के लोगों का दिल जीत लिया कि “वो 34 वर्षों की कमी को पूरा करने आये हैं”।

भले ही अपने भाषण में नमो ने वहां रह रहे भारतीयों की तारीफ के पुल बांधे हों लेकिन उनका लक्ष्य निवेशकों को लुभाना ही रहा। उन्होंने निवेशकों को यह भरोसा भी दिलाया कि भारत में तुरंत एक ख़राब डॉलर के निवेश के अवसर हैं। साथ ही उन्होंने इस बात का भरोसा भी दिलाया कि भारतीय बाजार में पैसा लगाना उनके लिए फायदे का सौदा ही होगा। प्रधानमंत्री ने निवेशकों का ध्यान इस और भी दिलाया कि अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक तथा क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज जैसे संस्थानों के अनुसार भारत विश्व की सबसे तेज बढ़ रही अर्थव्यवस्था है, जहाँ पैसा निवेश करने पर केवल मुनाफ़ा ही होगा। यूएई में मौजूद भारतीयों की तारीफ करते हुए नमो ने यह कहा कि भारतीयों ने यहाँ अपने श्रम और क्षमताओं का परचम पहले ही लहरा रखा है। मोदी ने अपने भाषण से वहां के लोगों का दिल इस प्रकार जीता कि उन पर यकीन करना किसी के लिए भी कठिन नहीं रहा होगा। अब नमो की विदेश नीति कितनी सफल होती है ये तो वक्त ही बताएगा, किन्तु उन्होंने वहां के लोगों में भारत में निवेश के प्रति विश्वास जरूर जगा दिया। यूएई के निवेशक भारत में कितना तथा किस प्रकार निवेश करते हैं यह काफी कुछ देश के अंदरूनी माहौल पर निर्भर करता है। फ़िलहाल तो केवल यही आशा की जा सकती है कि प्रधानमंत्री की विदेश नीति देश को विकास के मार्ग पर ले जाने में सहायक सिद्द होगी।

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स्वतंत्रता दिवस पर विशेष- आज़ादी के मायने

तमाम तरह की सजावट से लैस दिल्ली का लाल किला जहाँ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तिरंगा फहराकर देश को सम्बोधित किया। लाल किले के प्राचीर से यह उनका दूसरा सम्बोधन था। बच्चों में अपने प्रधानमंत्री से बात करने का उत्साह लाल किले पर आज देखा जा सकता था। मोदी जी से मिलने की खुशी से यह साफ़ जाहिर हो रहा था कि मानो बच्चों को प्रधानमंत्री से न जाने कितनी उम्मीदें हैं। और ऐसा होना भी चाहिए। देश के भविष्य को अपने देश के प्रधानमंत्री से उम्मीदें होनी जायज है। किन्तु जिस उज्जवल भारत के सपने ये छोटे-छोटे बच्चे देख रहे हैं उसे पूरा करने के लिए मौजूदा सरकार तत्पर भी है या फिर उम्मीदों के सपने देखकर ये बच्चे स्वयं के साथ ही धोखा कर रहे हैं। आज लाल किले पर सब कुछ वैसा ही हुआ जैसा एक वर्ष पूर्व हुआ था। ऐसा लग रहा था मानो सब कुछ एक कागज़ पर लिखा गया हो और उसे क्रमवार दोहराया जा रहा हो। प्रधानमंत्री का तिरंगा फहराना, उमीदों से भरा भाषण, बच्चों से मिलकर उनमें उत्साह भरना आदि सब पहले जैसा ही था।

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आजादी के दिन को पूरे देश में बहुत धूमधाम से मनाया जा रहा है। खासकर सरकार 15 अगस्त के इस दिन के लिए विशेष तैयारियों में जुटी नज़र आयी। स्कूलों, सरकारी संस्थानों, महाविद्यालयों, विश्विद्यालयों आदि में हर जगह तिरंगा लहराया नज़र आया। कहीं देश में “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” अभियान के अंतर्गत बेटियों से ही तिरंगा फहराया गया। क्या तिरंगे की शान में चार चाँद लगाने के लिए केवल एक ही दिन है, 15 अगस्त का? यदि सरकारें आजादी न मनाये तो क्या देश में इस दिन का इतना उत्साह देखने मिल सकता है? सच माने तो ऐसा नहीं होगा। देश इस समय इतना गरीबी, सुरक्षा, महंगाई से परेशान नहीं है जितना इस देश की सरकारों से है। देश के लोगों के पैसों पर भारी सुरक्षा के साथ बड़ी बड़ी गाड़ियों में घूमने वाले नेताओं की क्या यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि वो अपने निजी झगड़ों से हटकर देश के हित के लिए एक साथ आगे आएं। क्या पिछले दिनों मानसून सत्र में संसद में मचे हंगामे से देश वाकिफ नहीं है? बेवजह अपनी लड़ाई और जिद को जनता के हित में सही बताने का अधिकार है उन्हें? संसद में काम में अवरोध उत्पन्न करके जिस पैसे की बर्बादी की जा रही है वो उनकी जेब से खर्च हो रहे हैं? लेकिन इन सरकारों ने देश का जो हाल इस समय बना रखा है, उसके हल के लिए कोई प्रयास होते हीं दिखते। ऐसे में देश की जनता क्या करे? एक सरकार ने उम्मीदें तोड़ी तो दूसरी सरकार को मौका दिया, लेकिन उनके सिपेसालार ने तो साल भर में विदेश यात्राओं की ऐसी झड़ी लगाई कि देश के लोगों के लिए प्रधानमंत्री के दर्शन करने ही दुर्लभ हो गए।

कहने को हम आजाद हैं लेकिन यह आज़ादी केवल कागज़ों में ही सीमित नहीं रह गयी है? सोशियल मीडिया, अखबारों में, टीवी चैनलों पर स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें जोरों शोरो से दी जा रही हैं। लेकिन लगता तो ऐसा है कि आजादी केवल देश के राजनेताओं तक ही सीमित रह गयी है। कुछ भी बोलने की आज़ादी। एक दूसरे पर कीचड उछालने की आज़ादी। संसद में हंगामा करने की आज़ादी। बाकी सब तो आज भी गुलाम ही हैं। गरीब महंगाई का गुलाम है तो किसान कर्ज की ज़ंजीरों तले दबा है। कहीं देश प्रकृति का कहर झेल रहा है तो देश की सीमा पर खड़े जवान दिन रात गोलाबारी का सामना करके शहीद हो रहे हैं। ऐसे में आज़ादी के मायने समझना बहुत मुश्किल हो गया है। सरकारें तो देश की आज़ादी का उत्सव मना रही हैं लेकिन देश की सीमा पर गोलाबारी का सामना करने वाले जवानों को शायद आज की तारीख भी याद ना हो। उन्हें तो केवल अपनी भारत माता की रक्षा करना और उसके लिए मर मिटना ही याद है।

मेरे लिए तो देश की आजादी के इस दिन के कोई मायने रह ही नहीं जाते, जब देश के जवान इस दिन पर मिठाइयां तक नहीं बाँट पाते। जिन पर देश की सुरक्षा का जिम्मा है ताकि देश के लोग आज़ादी को खुलकर जी सकें, यदि वो ही उदास हैं तो क्या मायने निकलते हैं इस आज़ादी के? क्या उन देश वासियों को इस आज़ादी के सुख का मजा लेने का कोई अधिकार नहीं है जिनके परिवार का कोई न कोई सदस्य देश की सीमा पर तैनात है?  इस सबके बावजूद देश की सरकार कोई सख्त रूख अपनाने की बजाये दुश्मन देश की तरफ बातचीत का हाथ बढ़ा देती है जिसे वह हर बार ठुकरा देते हैं। देश में लगातार हमले हो रहे हैं। देश की शांती को भंग करने का निरंतर प्रयास जारी है। देश में हर तरफ चिंताजनक माहौल है और बात करते हैं आज़ादी  की। आखिर क्यों सबकुछ लाचार सा प्रतीत होता है? आज भी आज़ादी के मायने बिलकुल भी नहीं बदले हैं जिनसे हमारा देश आज आजादी के 68 साल बाद गुज़र रहा है। बल्कि अधिक खतरनाक हो चले हैं। ऐसा लगता है मानो पूरी आजादी सिमट कर समस्याओं के कब्जे में आ गई हों और छटपटाती हुई अपनी प्राण रक्षा के लिए पुकारती हो।

क्या कोई स्पष्ट रूप से बता सकता है कि आखिर हम आज़ाद हैं क्यों? आखिर होती क्या है ये आज़ादी? इसे हम त्यौहार की तरह क्यों मनाएं? क्या राजनेताओं के सिवा कोई और भी जानता है इसका अर्थ? लाल किले के प्राचीर से हुई लुभावनी घोषणाएं जनता के लिए इतनी मायने नहीं रखती जितनी सत्ताधारियों के लिए रखती है। सत्ता आपके पास है। बहुमत आपके पास है। जनता आपकी है और आपको टकटकी लगाए देख रही है। सबकुछ तो है फिर कौनसी वजह है कि इन डेढ़ वर्षो में जमीनी स्तर पर नतीजे  में सिर्फ बाबा जी का ठुल्लु ही हाथ लगा है। सीमापार बैठे लोग रोज आपको धमकिया दे रहे हैं। एक शांती का दुश्मन देश आपकी छाती पर मूंग दल रहा है।आपकी भारत माता के शीश कश्मीर को अपने पंजे में लेकर नोचने खरोंचने का प्रयत्न करता है। फिर क्या वजहें हैं कि अलगाववादियों की ताकत आपकी ताकत से अधिक जान पड़ रही है। वो भी तब जब आप दिल्ली में बैठे ही इस इरादे से थे कि आप कश्मीर को अपना हिस्सा और आतंकवाद को ख़त्म कर देंगे. तब आखिर क्या कारण है कि आतंकवाद के मामले पर आप अपना पक्ष मजबूती से रख ही नहीं पा रहे?

फिर भी देशवासियों के पास फिलहाल आपसे उम्मीदें लगाए रखने की जगह कोई विकल्प नहीं है। आपको समय दिया है तो उस समय का सदुपयोग करने की जरूरत को समझिए। क्योंकि बदलाव और अच्छे दिन की आस नई सरकार पर विश्वास के कारण है। इस विश्वास को न सिर्फ बनाए रखने बल्कि उसे साकार करने की जरूरत है। आज़ादी केवल कागज़ों की रौनक ना बढाए बल्कि देशवासियों के दिल में उमंग और उत्साह भर दे। आज़ादी के इस दिन यही कामना है कि लालकिले से जो घोषणाएं की गयी है वो सत्यता में परिवर्र्तित हो जाएं. और खुशी और आज़ादी का असली माहौल देश में दिखाई दे।

माना गीदड़ भभकी, लेकिन इसे गंभीरता से ले सरकार

एक खत और माहौल तनावपूर्ण। देश की न्यायपालिका में एक बार फिर से उस समय तनावपूर्ण स्थिति पैदा हो गयी जब सुप्रीम कोर्ट के जज दीपक मिश्र को
जान से मारने की धमकी वाला खत मिला। ये खबर और भी चिंताजनक इसलिए भी हो जाती है क्यूंकि दीपक मिश्र सुप्रीम कोर्ट के वही जज हैं जिन्होंने याकूब मेमन की फांसी के पुष्टि की थी। इस खत में लिखा है कि “”चाहे जितनी भी सुरक्षा मिली हो, हम तुमको ख़त्म कर देंगे”। इस धमकी को अधिक गंभीरता से लेना इसलिए भी बेहद जरूरी है क्यूंकि जब 30 जुलाई को याकूब मेमन को फांसी दी जानी थी उससे तकरीबन डेढ़ घंटा पहले 1993 मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड टाइगर मेमन ने “वॉयस ओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल” के जरिये अपनी माँ से फ़ोन पर याकूब को फांसी देने वालों से बदला लेने की बात कही थी। टाइगर ने फोन पर अपनी माँ से कहा कि, ” सबके आंसू जाय नहीं जाएंगे। उनको इसकी कीमत चुकानी होगी”। हालांकि उसकी माँ ने उसे ऐसा करने से मना किया लेकिन वो लगातार अपनी बातचीत में बदला लेने की बात बोलता रहा।

इन सब बातों के बाद सरकार इस धमकी को हल्के में नहीं ले सकती। उन्हें इस बात को पूरी गंभीरता से लेना होगा और न्यायपालिका की सुरक्षा को भी सुनिश्चित करना होगा। सरकार इस बात को इसलिए भी नजरअंदाज नहीं कर सकती कि ये धमकी उन लोगों की तरफ से दी गयी है जिनके लिए बेगुनाहों का खून बहाना कोई नयी बात नहीं है। ये वही लोग है जो 22 साल पहले मुंबई में खून-खराबा मचा चुके हैं और आज भी भारत की एकता और अखन्ड्ता को तोड़ने के प्रयास में लगे हैं। हालांकि यह सबको पता है कि वो ऐसा इसलिए कर पाते हैं क्यूंकि पाकिस्तान उन्हें अपने देश में पनाह दिए हुए है। इस बात के भी पुख्ता सबूत हैं कि पाकिस्तानी सरकार भी उन्हें भारत में क़त्ल-ए-आम मचाने में सहयोग कर रही है। पाकिस्तान सरकार का हाथ इनकी पीठ पर होने की वजह से ही ये दुनिया में खासकर भारत में अपनी आतंकी गतिविधियों को बेखौफ अंजाम देने में कई बार सफल हुए हैं।

याकूब मेमन की फांसी से पहले और बाद क्रमशः दीनानगर तथा उधमपुर बीएसएफ कैम्प पर हुए आतंकवादी हमले ने न्यायमूर्ति दीपक मिश्र को दी गयी धमकी को और भी संगीन बना दिया है। पाकिस्तान भी निरंतर दाऊद इब्राहिम तथा टाइगर मेमन की मदद से भारत विरोधी आतंकवादी गतिविधियों को तेज करने में प्रयासशील है। ऐसे में इस बात को ठुकराया नहीं जा सकता कि दाऊद इब्राहिम के अंडरवर्ल्ड के लोग भारत में किसी बड़ी शख्सियत को निशाना बनाने की फ़िराक में हों। प्रधान न्यायधीश एचएल दत्तू ने निडरता का परिचय देते हुए कहा कि जजों पर न्यायपालिका की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। इसलिए जज ऐसी धमकियों से बेखौफ रहते हुए अपना काम करते है। ऐसी धमकियों से घबराने की जरूरत नहीं है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत की न्यायपालिका भविष्य में भी ऐसे अपराधियों को कड़ी से कड़ी सज़ा देने के लिए कभी पीछे नहीं हटेगी। पर सरकार किसी भी जानलेवा घटना होने का अंदेशा होने पर उसे नजरअंदाज नहीं कर सकती। केवल न्यायमूर्ति दीपक मिश्र को ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण सर्वोच्च न्यायालय, याकूब मामले से जुड़े जजों तथा गवाहों को भी कड़ी सुरक्षा मिलनी चाहिए। हालंकि सरकार ने इस धमकी भरे खत पर अपना रूख साफ़ करते हुए कहा कि देश किसी भी आतंकी की गीदड़ भभकियों से नहीं डरेगा। लेकिन माना गीदड़ भभकी ही सही पर सरकार इसे गंभीरता से ले। सरकार को लोगों के सामने ये सन्देश स्थापित करना होगा कि दहशतगर्द चाहे किसी भी रूप में छिपकर आएं, उन्हें मुहतोड़ जवाब मिलेगा। देश के न्यायपालिका की सुरक्षा में कोई भी कसर बाकी नहीं रहेगी। देश के शांतिमय माहौल व् एकता तथा अखन्ड्ता को नुक्सान पहुँचाने वाले दहशतगर्दों का अंजाम अफजल गुरु, अजमल कसाब तथा याकूब मेमन जैसा ही होगा।

इलैक्ट्रॉनिक ट्रैफिक सिग्नल का जन्म

विश्व में लगातार तेज़ी से बढ़ रहे आधुनिकीकरण ने जहाँ लोगों की ज़िंदगी को आसान बना दिया है , वही इसने कुछ समस्यायों को भी जनम दिया है। जिसमें से एक है ट्रैफिक की समस्या। जहाँ भी जाओ गाड़ियों के चहल पहल नज़र आ ही जाती है। आज के समय में नाममात्र लोग ही होंगे जो कहीं आने जाने के लिए वाहन का प्रयोग ना करते हों। हर कोई अपना समय बचाने के लिए किसी ना किसी वाहन से सफर करता है। लेकिन इस नए युग की इस सुविधा ने ट्रैफिक की समस्या उत्पन्न कर दी है। इसी समस्या के चलते लोग घंटों तक जाम में फंसे रहते हैं। कई बार तो एम्बुलैंस भी ऐसे जाम में फंस जाती है जिससे किसी की जान तक चली जाती है। लेकिन एक ऐसी तकनीक जिसने इस ट्रैफिक की समस्या को पूरी तरह से समाप्त तो नहीं किया  लेकिन काफी हद तक सुधार अवश्य दिया। इस तकनीक का नाम है ” इलैक्ट्रोनिक ट्रैफिक सिग्नल प्रणाली“. जिसे हम स्थानीय भाषा में रेड लाइट ट्रैफिक सिग्नल भी बोल देते हैं। तो चलिए जानते हैं कि इस तकनीक कआ जन्म कहाँ हुआ और कहाँ इसे सबसे पहले प्रयोग किया गया था?

तस्वीर में एक व्यक्ति ट्रैफिक सिग्नल लगाता हुआ
तस्वीर में एक व्यक्ति ट्रैफिक सिग्नल लगाता हुआ

सड़कों पर यातायात की समस्या को नियंत्रित करने का श्रेय यूनाइटिड स्टेट्स अमेरिका को जाता है। अमेरिका पहला ऐसा देश बना जहाँ पर सबसे पहले यातायात की बढ़ती तादात को आँका गया। हालांकि इस तकनीक के प्रयोग से पहले भी अमेरिका की सड़कों पर ट्रैफिक पुलिस अधिकारी यातायात को संभालते थे लेकिन अब ये उनके लिए नियत्रित कर पाना भी मुश्किल हो रहा था। इस तकनीक का मुख्य उद्देश्य ना केवल ट्रैफिक को नियंत्रित करना था बल्कि सड़क हादसों पर लगाम कसना भी था। इसका प्रयोग सबसे पहले चौराहों पर ही किया गया किन्तु आजकल कई बड़े महानगरों में इसे चौराहों के अलावा अन्य जगहों पर भी देखा जाता है, जहाँ पर लोगों की चहलकदमी अधिक है।

विश्व का पहला इलैक्ट्रोनिक ट्रैफिक सिग्नल 5 अगस्त, 1914  को अमेरिका के ओहायो राज्य के क्लीवलैंड शहर की “105  वी  एंड यूक्लिड” सड़क पर लगाया गया था। इसे “जेम्स हॉग” ने डिजाइन किया था। कुछ अन्य शहरों में सफलतापूर्वक प्रयोग के बाद 1918 में हॉग ने इसे पेटेंट करवा लिया। हालांकि अमेरिका में डिजाइन की गयी इस तकनीक से पहले भी ट्रैफिक सिग्नल लगाए गए थे। इसे 9 दिसंबर 1868 को यूनाइटिड किंगडम के लंदन में ब्रिटिश संसद के पास लगाया गया था। किन्तु यह प्रयोग सफल नहीं हुआ। ये गैस आधारित ट्रैफिक सिग्नल थे जिसमें अचानक विस्फोट हो जाता था। अमेरिकी इलैक्ट्रॉनिक ट्रैफिक सिग्नल प्रणाली  ने ट्रैफिक के नियंत्रण को ना केवल एक दिशा प्रदान की बल्कि उन पुलिस कर्मियों को भी राहत दी जो ट्रैफिक नियंत्रित करने के लिए कई बार अपनी जान तक जोखिम में डाल देते थे। जिन शहरों में इसका प्रयोग किया गया वहां जन-चेतना के लिए कई प्रोग्राम किये गए जिससे कि लोगों को इस इलैक्ट्रोनिक ट्रैफिक प्रणाली के बारे में जागरूक किया जा सके। इसमें लाल व् हरे रंग की लाईट का प्रयोग किया गया था। लोगों को इन लाइटों को लगाने का अर्थ समझाया गया। धीरे-धीरे ये तकनीत विश्व भर में प्रचलित हो गयी। आज ज्यादातार देशों में इस प्रणाली को प्रयोग किया जा रहा है.।

अपने धर्म को भूल रहा है मीडिया

आज के समय में राजनीती और बांटना शायद एक सिक्के के दो पहलुओं की तरह एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। आज के दौर के हिसाब से देखा जाए तो राजनीती का छिपा हुआ अर्थ ही बांटना है या यूँ कह लीजिये की बांटने को ही आज के समय की राजनीती कहते हैं। यह मान लेना कतई गलत नहीं होगा कि राजनीती का तो काम ही बांटने का है और अगर वे बांटेंगे नहीं तो अपनी कुर्सियों को ज्यादा समय तक बचा के नहीं रख पाएंगे। देखा जाये तो हैदराबाद के ओवैसी से लेकर दिग्विजय सिंह, शशि थरूर सबको याकूब के मुदद्दे पर हंगामा मचाने के लिए क्षमादान दिया जा सकता है क्यूंकि वो सब तो अपने आज के राजनीती धर्म का पालन कर रहे थे। देश पर अपना शासन अथवा प्रभुत्व जमाने के लिए ऐसा करने की प्रेरणा शायद उन्होंने अंग्रेजों के प्रसिद्द नारे “फूट डालो और राज़ करो” से ली है। राजनीति का तो काम ही लोगों को बांटना है लेकिन मीडिया को कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है, जिसने देश के सामने सत्यता को प्रकट करने की शपथ ले रखी है। लगभग एक सप्ताह पहले मीडिया ने देश के लोगों को धर्म के नाम पर बांटने में खूब बड़ी भूमिका अदा की। अपने जान-जागरण के संकल्प को भूलकर मीडिया ने अपने चैनलों की टीआरपी बढ़ाने में अपना पूरा जोर लगा दिया। भले ही उससे देश के भीतर कैसा भी माहौल क्यों ना पैदा हो।

12 मार्च 1993 को खून से लथपथ वो मंजर कभी भुलाया नहीं जा सकता, जिसने ना जाने कितने ही घरों के चिराग भुजा दिए, कितनो को यतीम और बेऔलाद कर दिया। जिस मामले में याकूब मेमन को फांसी हुई वो हमारे लिए विवाद का विषय है। जिस मामले में इस आतंकवादी को फांसी की सज़ा हुई उस खौफनाक हादसे के दिन मुंबई शहर के सेंचुरी बाजार की ही घटना पर गौर कर ले तो आपकी आत्मा कांप जाएगी कि वहां याकूब मेमन और उसके साथियों ने इस बात की रैकी(जांच) की थी कि धमाका करने के लिए किस जगह पर बारूद भरा जाए ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग मारे जा सकें। याकूब ने बाजार के मैनहोल में विस्फोटक भरवाया था, जिसके ऊपर से स्कूल बस के गुजरते ही बम फटा था। सिर्फ इसी जगह पर मरने वालों में 100 से अधिक बच्चे, महिलाएं तथा कुछ बुजुर्ग भी थे। लेकिन मीडिया और राजनीति इस मामले पर भी आपस में बंटी हुई नज़र आई।

याकूब मेमन की फांसी की खबर को, हमारे देश का सम्मान कहे जाने वाले हमारे राष्ट्रपुरुष वैज्ञानिक डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की खबर से ज्यादा तवज्जो देकर टेलिसीजन मीडिया ने जिस प्रकार देशवासियों के भावनाओं का अपमान किया है, वो माफ़ी के काबिल नहीं है। देश की प्रिंट मीडिया ने तो सयम दिखाकर कैसे न कैसे अपनी साख बचा ली लेकिन टेलीविजन मीडिया ने तो बेशर्मी की सारी हदें ही पार कर दी। असदुद्दीन ओवैसी जो उस हत्यारे आतंकवादी को बचाने के लिए मुसलामानों को हिन्दुओं के खिलाफ भड़का रहा था, उसे तो ये चैनल वाले लाइव दिखाते रहे और देश के महान वैज्ञानिक जो देशवासियों को हमेशा के लिए अलविदा कह चले थे उनके लिए मीडिया के पास बिलकुल भी समय नहीं था? क्या  क्या मीडिया केवल सनसनी फैलाने को ही अपना सामजिक दायित्व समझती है? आतकवाद के खिलाफ लड़ना क्या सिर्फ सराकरों, सेना और देश के लोगों की ही जिम्मेदारी है ? क्या मीडिया की इसमें कोई भूमिका नहीं हो सकती? अगर हो सकती है तो मीडिया का दायित्व नहीं बनता था कि वो आतंकवादियों के पक्ष में भोंकने वाले लोगों को ना दिखाकर उन परिवारों के लोगों से बात करे जिन्होंने 1993 में अपना सब कुछ खो दिया था। क्या मीडिया का यह जानना फर्ज नहीं बनता था कि याकूब की फांसी ने पीड़ितों के जख्मों पर किस कद्र मरहम लगाने का काम किया है?

लेकिन देश का चौथा स्तम्भ कहे जाने वाली मीडिया के पास पीड़ितों के मन का हाल जानने का समय कहाँ था। उन्हें तो देश में सनसनी फैलाने का महत्वपूर्ण कार्य जो करना था। आखिर यह कैसी पत्रकारिता है जिसके संदेशों से यह ध्वनित हो रहा है कि हिन्दुस्तान के मुसलमान एक आतंकी की मौत पर दुखी हैं? क्या इससे दो धर्मों के लोगों में रिश्तेेे कमजोर नहीं होंगे? आतंकी के मुसलामानों से तुलना करना क्या हिन्दुस्तान के बाकी मुसलमानों के साथ अन्याय नहीं होगा? मेरी ऐसा मानना है कि हिन्दुस्तान का मुसलमान किसी हिन्दू से कम देशभक्त नहीं है। लेकिन ओवैसी जैसे लोगों को मुस्लिमों का प्रतिनिधी मानकर उसके विचारों को सारे मुसलामानों के राय मान लेना क्या मुसलामानों के साथ अन्याय नहीं होगा? लेकिन मीडिया ने वोट की राजनीती करने वाले ओवैसी की निराधार बयानबाजी को ज्यादा हवा देकर अपनी नासमझी का प्रमाण दिया है। आखिर क्यों मीडिया भारतीय मुसलामानों को अलग नजर से देखती है? क्या आतंकवादी गतिविधियों में केवल हिन्दू ही मारे जाते हैं मुसलमान नहीं?

दोनों कौमों की लड़ाई सामान ही है। दोनों के सुख-दुःख एक ही हैं। आतंकवाद का जितना प्रभाव हिन्दुओं पर पड़ता है उतना ही मुसलामानों या अन्य धर्म के लोगों पर भी पड़ता है। दोनों के सामने बेरोजगारी, गरीबी, महंगाई मुँह फाड़े खड़ी है। वे भी दंगों में मरते और मारे जाते हैं। बम उनके बच्चों को भी अनाथ बनाते हैं। तो फिर मीडिया को क्या जरूरत पडी है कि वो उनको अलग अलग नज़र से देखकर दोनों का बांटने का काम करे? देश की अदालतें जाति या धर्म देखकर फैसले करती हैं, यह कहना तो बिलकुल ही गलत है। फांसी दी जाए या न दी जाए इसके पहलुओं पर विचार करना बेहद आवश्यक है, किन्तु जब तक हमारे देश में यह सजा मौजूद है तब तक किसी की फांसी को साम्प्रदायिक रंग देना कहां की समझदारी है? दिग्विजय सिंह और शशि थरूर तब कहां थे जब कांग्रेस के कार्यकाल में फांसी हुई थी? इसलिए देश की एकता और अखंडता को ठेस पहुंचाने वाले की सज़ा के विरुद्ध खड़े होना, देश के सर्वोच्च न्यायालय तथा महामहीेम राष्ट्रपति के विवेक पर संदेह करना अपने आप में एक अपराध ही है।

डा. कलाम ने एक बार मीडिया विद्यार्थियों को शपथ दिलाते हुए कहा था, ‘‘मैं मीडिया के माध्यम से अपने देश के बारे में अच्छी खबरों को बढ़ावा दूंगा, चाहे वे कहीं से भी संबंधित हों। क्या मीडिया कलाम  साहब को दिए इस वचन को निभा रही है? देश की धर्मनिरपेक्षता का नारा “हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख-ईसाई आपस में सब भाई भाई”, सुनने में और पढ़ने में तो बहुत अच्छा लगता है किन्तु क्या सच में हम इस नारे का सम्मान कर पा रहे हैं? हम बंटे हुए लोग इस देश को कैसे एक रख पाएंगे? सभी धर्म के लोगों में दरार पैदा करने वाली राजनीति हो रही है और मीडिया भी इसे अपने चैनलों पर खूब उछाल रहा है। क्या ऐसा करना सही है? मीडिया अपने धर्म को भूल रही है। मीडिया को आखिर ये अधिकार किसने दिया कि वह ऐसी बयानबाजियों को दिखाए जिससे देश का माहौल बिगड़ सकता है। मीडिया को यह समझना होगा कि उसका काम बहुत ही जिम्मेदारी वाला काम है। मीडिया को आखिर यह कौन समझाएगा कि भारतीय हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों के नायक भारतरत्न कलाम हैं न कि कोई आतंकवादी. मीडिया आतंकवाद को खत्म करने में बहुत बड़ी भूमिका निभा सकता है. बस जरूरत है तो सत्यता, निष्पक्षता और ईमानदारी से काम करने की।

संसदीय गतिरोध पर सांसदों के निलंबन को नियम का रूप ले लेना चाहिए

संसद की कार्यवाही में लगातार रुकावट पैदा होने से जनता में निराशा और लाचारी की भावना पनप रही है।  संसदीय गतिरोध ने जनता को ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या संसद में मौजूद अलग-अलग पार्टियों के नेता देश के मुद्दों पर लड़ रहे हैं या अपने निजी राजनीतिक मसलों के लिए।  संसद में मूर्खों की तरह लड़ते झगड़ते हुए देश के नेताओं को देखकर जनता को यह तो एहसास हो ही गया है कि उन्होंने इन लोगों को संसद तक पहुंचाकर बहुत बड़ी भूल कर दी है।  ऐसा प्रतीत होता है मानो ये संसद में केवल एक दुसरे की पार्टी पर कीचड उछलने के लिए ही जाते हैं।  देश में क्या घट रहा है, देश किन-किन समस्यायों से झूझ रहा है, इससे इन्हें कोई लेना देना ही नहीं है।  देश में कहीं आतंकवादी घुसपैठ कर जाते हैं तो कहीं सीमा पर खड़े देश के जवान देश के लिए शहीद हो जाते हैं. कही बाढ़ की स्थिति है तो कहीं महामारी की, इस बात से तो जैसे इन्हें कोई फर्क ही नहीं पढता।  बावजूद इसके प्रत्येक पार्टीे अपने आप को देश की सबसे बड़ी हिमायती होने का दावा करने से पीछे नहीं हटती।

सोमवार को बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में संसदीय गतिरोध पर बातचीत का क्या नतीजा होना था, ये तो जनता को पहले से ही ज्ञात था।  लेकिन कांग्रेस की संसदीय दाल के बैठक में सोनिया गांधी ने संसदीय गतिरोध की समस्या को सुलझाने की बजाए और अधिक उलझाने के संकेत अवश्य दे दिए।  सोनिया गांधी ने गुस्सैल रूख अपनाकर ये तो साफ़ कर दिया कि संसद की कार्यवाही इतनी आसानी से नहीं चलने देगी।  उनके इसी रवैये ने लोकसभा स्पीकर को संसद के नियम 374 का इस्तेमाल करने पर मजबूर कर दिया।  इस नियम के तहत लोकसभा स्पीकर संसदीय कार्यवाही में रुकावट पैदा करने वालों को संसद से निलंबित कर सकते हैं।  इसी नियम के अनुसार ही स्पीकर सुमित्रा महाजन ने कांग्रेस के 25 सदस्यों को 5 दिन के लिए संसद से बाहर का रास्ता दिखा दिया।  लोकसभा स्पीकर ने इन सदस्यों को संसद में गतिरोध उत्पन्न करने के सन्दर्भ में पहले ही चेतावनी दी थी जिसे कांग्रेस के सदस्यों ने नजरअंदाज कर दिया।  अब संसद में सत्तापक्ष और विपक्ष में बातचीत के कोई आसार नजर नहीं आते हैं।  देश की जनता का दुर्भाग्य है कि उन्हें मानसून  सत्र में देश के हित में कुछ भी होता हुआ नजर नहीं आ रहा है।

लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन  के सख्त रूख अपनाने से विपक्ष और भी अधिक तिलमिला उठा है।  अब वो अन्य राजनीतिक दल भी सुमित्रा महाजन के इस रवैये का विरोध कर रहे हैं जो “इस्तीफा नहीं तो काम नहीं” के कांग्रेस के नारे के खिलाफ थे।  कांग्रेस सरकार को संसद की कार्यवाही को आगे बढ़ाने से ज्यादा दिलचस्पी आईपीएल के पूर्व चेयरमैन ललित मोदी से जुड़े केस में घिरी सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे तथा व्यापम घोटाले के कारण मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का इस्तीफा लेने में है।  कांग्रेस इन सब के इस्तीफे पर अड़ी  है।  इसलिए ही कांग्रेस ने इस नारे को जनम दिया है कि “इस्तीफा नहीं तो काम नहीं”।  स्पीकर के कड़े रूख को लेकर विपक्षी पार्टियों का भी संसद में एकमत नहीं है।  जहां वामदलों और जनता दल (यू) ने इसका समर्थन किया वहीँ तृणमूल कांग्रेस ने इसे संसदीय परम्परा के विरुद्ध बताया।  इसी विरोध के साथ ही तृणमूल कांग्रेस ने अगले 5 दिन तक संसद का बहिष्कार करने का निर्णय भी सुना डाला।  सोनिया गांधी ने कहा था कि “कल के हंगामेबाज आज बहस आर विचार-विमर्श के समर्थक बन गए हैं”।  लेकिन अब यही बात कांग्रेस के लिए बोली जाये तो कहा जा सकता है कि “कल के बहस के हिमायती आज हंगामेबाज़ बन गए हैं”।

यदि निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो सुमित्रा महाजन का यह कदम उचित है।  लोकसभा में दुर्व्यवहार सभी को शर्मिन्दा करता है. ऐसा होना ही नहीं चाहिए कि नौबत यहाँ तक आ जाये। कांग्रेस सांसदों का निलंबन नियमों के लिहाज से जायज है।  अब इसे स्थायी नियम का रूप ले लेना चाहिए।  चाहे कोई भी हो सत्तापक्ष या विपक्ष।  संसद का अपमान करने वालो तथा ससदीय कार्यवाही में खलल उत्पन्न करने वालों पर कार्यवाही होनी ही चाहिए। सवाल यह उठता है कि पिछले कुछ समय से संसद में जो संसदीय कार्यवाही का विरोध करने की परम्परा बन रही है, उसके रहते क्या देश के हित में कोई भी निर्णय लेना संभव होगा? जनता को तो नहीं लगता।  अब इसका हल तो सभी दलों को पुनर्विचार करके ही निकालना होगा।  उन्हें समझना होगा कि जनता ने उन्हें राष्ट्र हित में कार्य करने के लिए चुना है, ना कि अपने राजनीतिक स्वार्थ को पूरा करने के लिए।  देश की आम जनता निराश है लेकिन अभी भी उम्मीद भरी नजरों से संसद की तरफ देख रही है।  इसका सम्मान करना ही होगा.

फ्रेंडशिप डे पर विशेष- यादगार पलों में सिमटी दोस्ती

फ्रेंडशिप डे यानी दोस्ती का वो दिन जब हम अपने दोस्तों और दोस्ती के लिए शुभकामनायें मांगते है। दुआ करते हैं कि हमारे अच्छे दोस्त हमेशा ही हमारे साथ बने रहे। लेकिन हम में से शायद बहुत से लोगों को इस दिन के पीछे का इतिहास नहीं पता होगा। मतलब ये दिन क्यों मनाया जाता है? साल भर में केवल इस दिन को फ्रेंडशिप डे क्यों कहा जाता है? क्या सभी देशों में यह दिन एक ही दिन मनाया जाता है या अलग-अलग दिन? आखिर क्यों हम दोस्ती के इस दिन को इतना तवज्जो देते हैं? क्यों इस दिन हम अपने घर में एलबम्स खोल खोल कर पुरानी तस्वीरों को देखकर अपने दोस्तों के साथ बिताये हुए लम्हों को याद करते हैं? तो हम आपको इस सब सवालों का जवाब दते हैं और बताते हैं इस दिन के मायने..

दरअसल फ्रेंडशिप डे पश्चिमी सभ्यता की सोच और मांग है जहां के एकल जीवन में अकसर दोस्तों का महत्व बेहद कम हो जाता है। लोगों के जीवन में कम होती दोस्ती की अहमियत को सझते हुए तथा दोस्तों का जीवन में बनेेेे रहने पर उनका आभार व्यक्त करने के लिए अमेरिकी कांग्रेस ने सन 1935 में फ्रेंडशिप डे मनाने की घोषणा कर दी थी। अमेरिकी कांग्रेस के इस घोषणा के बाद हर राष्ट्र में अलग-अलग दिन फ्रेंडशिप डे मनाया जाने लगा। विश्व के अधिकतर देशों में यह दिन अगस्त के पहले रविवार को मनाया जाता है।  सन 2011 से संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस दिन को एकरूपता देने और पहले से अधिक धूमधाम से मनाने के उद्देश्य से 30 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय फ्रेंडशिप डे घोषित कर दिया लेकिन बावजूद इसके अधिकतर देशों में इसे अगस्त के पहले रविवार को ही मनाया जाता है भले तारीख कुछ भी हो।

दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जो हमारे जन्म से नहीं होता। इस खूबसूरत रिश्ते को हम खुद बनाते हैं। इस रिश्ते पर हम सबसे अधिक भरोसा करते हैं। दोस्तों से हम अपने मन की हर बात कर लेते हैं। दोस्ती का रिश्ता जात-पांत, लिंग भेद तथा देश की सीमाओं को नहीं जानता। ‘दोस्त’ कहने को तो हज़ारों मिल जाते हैं लेकिन अच्छे दोस्तों का कोई मोल नहीं होता। इन दोस्तों के लिए हमें कोई मोल तो नहीं चुकाना होता लेकिन इनकी दोस्ती बहुत अनमोल होती है। एक सच्चा दोस्त आपकी जिंदगी को सही राह पर ले जाने में बहुत सहायक होता है. जो जादू बड़े से बड़े जादूगरों में नहीं होता वह अकसर दोस्तों में होता है और इन्हीं दोस्तों को समर्पित है “फ्रेंडशिप डे”।

कभी आभास तो कभी एहसास है दोस्ती।
टेढ़ी मेढ़ी जलेबी कि तरह, पर शहद की मिठास है दोस्ती।।

भारत में फ्रेंडशिप डे

फ्रेंडशिप डे तो भारत में भी सभी देशों की तरह एक ही दिन को मनाना शुरू हुआ था लेकिन भारत में प्राचीन सभ्यता से ही दोस्ती की कई मिसालें हमारे प्राचीन ग्रंथों में पढ़ने को मिलती हैं। भगवान राम की वानर राज सुग्रीव से दोस्ती, भगवन श्री कृष्ण की सुदामा से दोस्ती, वीर अर्जुन की अपने सखा श्री कृष्ण से दोस्ती। प्राचीन ग्रंथों में विद्यमान  दोस्ती की इन मिसालों को भला भुलाया कैसे जा सकता है। दोस्ती की रिश्ते में दोस्तों के लिए हमेशा एक समर्पण भाव होता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण महाभारत का योद्धा कर्ण है, जो अपने मित्र दुर्योधन के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित था। तभी तो दोस्ती की मिसाल देते हुए अक्सर कहा जाता है कि “जीवन में एक मित्र श्री कृष्ण जैसा अवश्य होना चाहिए जो तुम्हारी तरफ से युद्ध तो ना करे लेकिन तुम्हें सही मार्ग पर चलने के लिए तुम्हारा मार्गदर्शन अवश्य करे, और एक मित्र सूरवीर कर्ण जैसा भी अवश्य होना चाहिए जो संकट की घड़ी में चट्टान बनकर तुम्हारे आगे खड़ा रहे “।