अपने धर्म को भूल रहा है मीडिया

आज के समय में राजनीती और बांटना शायद एक सिक्के के दो पहलुओं की तरह एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। आज के दौर के हिसाब से देखा जाए तो राजनीती का छिपा हुआ अर्थ ही बांटना है या यूँ कह लीजिये की बांटने को ही आज के समय की राजनीती कहते हैं। यह मान लेना कतई गलत नहीं होगा कि राजनीती का तो काम ही बांटने का है और अगर वे बांटेंगे नहीं तो अपनी कुर्सियों को ज्यादा समय तक बचा के नहीं रख पाएंगे। देखा जाये तो हैदराबाद के ओवैसी से लेकर दिग्विजय सिंह, शशि थरूर सबको याकूब के मुदद्दे पर हंगामा मचाने के लिए क्षमादान दिया जा सकता है क्यूंकि वो सब तो अपने आज के राजनीती धर्म का पालन कर रहे थे। देश पर अपना शासन अथवा प्रभुत्व जमाने के लिए ऐसा करने की प्रेरणा शायद उन्होंने अंग्रेजों के प्रसिद्द नारे “फूट डालो और राज़ करो” से ली है। राजनीति का तो काम ही लोगों को बांटना है लेकिन मीडिया को कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है, जिसने देश के सामने सत्यता को प्रकट करने की शपथ ले रखी है। लगभग एक सप्ताह पहले मीडिया ने देश के लोगों को धर्म के नाम पर बांटने में खूब बड़ी भूमिका अदा की। अपने जान-जागरण के संकल्प को भूलकर मीडिया ने अपने चैनलों की टीआरपी बढ़ाने में अपना पूरा जोर लगा दिया। भले ही उससे देश के भीतर कैसा भी माहौल क्यों ना पैदा हो।

12 मार्च 1993 को खून से लथपथ वो मंजर कभी भुलाया नहीं जा सकता, जिसने ना जाने कितने ही घरों के चिराग भुजा दिए, कितनो को यतीम और बेऔलाद कर दिया। जिस मामले में याकूब मेमन को फांसी हुई वो हमारे लिए विवाद का विषय है। जिस मामले में इस आतंकवादी को फांसी की सज़ा हुई उस खौफनाक हादसे के दिन मुंबई शहर के सेंचुरी बाजार की ही घटना पर गौर कर ले तो आपकी आत्मा कांप जाएगी कि वहां याकूब मेमन और उसके साथियों ने इस बात की रैकी(जांच) की थी कि धमाका करने के लिए किस जगह पर बारूद भरा जाए ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग मारे जा सकें। याकूब ने बाजार के मैनहोल में विस्फोटक भरवाया था, जिसके ऊपर से स्कूल बस के गुजरते ही बम फटा था। सिर्फ इसी जगह पर मरने वालों में 100 से अधिक बच्चे, महिलाएं तथा कुछ बुजुर्ग भी थे। लेकिन मीडिया और राजनीति इस मामले पर भी आपस में बंटी हुई नज़र आई।

याकूब मेमन की फांसी की खबर को, हमारे देश का सम्मान कहे जाने वाले हमारे राष्ट्रपुरुष वैज्ञानिक डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की खबर से ज्यादा तवज्जो देकर टेलिसीजन मीडिया ने जिस प्रकार देशवासियों के भावनाओं का अपमान किया है, वो माफ़ी के काबिल नहीं है। देश की प्रिंट मीडिया ने तो सयम दिखाकर कैसे न कैसे अपनी साख बचा ली लेकिन टेलीविजन मीडिया ने तो बेशर्मी की सारी हदें ही पार कर दी। असदुद्दीन ओवैसी जो उस हत्यारे आतंकवादी को बचाने के लिए मुसलामानों को हिन्दुओं के खिलाफ भड़का रहा था, उसे तो ये चैनल वाले लाइव दिखाते रहे और देश के महान वैज्ञानिक जो देशवासियों को हमेशा के लिए अलविदा कह चले थे उनके लिए मीडिया के पास बिलकुल भी समय नहीं था? क्या  क्या मीडिया केवल सनसनी फैलाने को ही अपना सामजिक दायित्व समझती है? आतकवाद के खिलाफ लड़ना क्या सिर्फ सराकरों, सेना और देश के लोगों की ही जिम्मेदारी है ? क्या मीडिया की इसमें कोई भूमिका नहीं हो सकती? अगर हो सकती है तो मीडिया का दायित्व नहीं बनता था कि वो आतंकवादियों के पक्ष में भोंकने वाले लोगों को ना दिखाकर उन परिवारों के लोगों से बात करे जिन्होंने 1993 में अपना सब कुछ खो दिया था। क्या मीडिया का यह जानना फर्ज नहीं बनता था कि याकूब की फांसी ने पीड़ितों के जख्मों पर किस कद्र मरहम लगाने का काम किया है?

लेकिन देश का चौथा स्तम्भ कहे जाने वाली मीडिया के पास पीड़ितों के मन का हाल जानने का समय कहाँ था। उन्हें तो देश में सनसनी फैलाने का महत्वपूर्ण कार्य जो करना था। आखिर यह कैसी पत्रकारिता है जिसके संदेशों से यह ध्वनित हो रहा है कि हिन्दुस्तान के मुसलमान एक आतंकी की मौत पर दुखी हैं? क्या इससे दो धर्मों के लोगों में रिश्तेेे कमजोर नहीं होंगे? आतंकी के मुसलामानों से तुलना करना क्या हिन्दुस्तान के बाकी मुसलमानों के साथ अन्याय नहीं होगा? मेरी ऐसा मानना है कि हिन्दुस्तान का मुसलमान किसी हिन्दू से कम देशभक्त नहीं है। लेकिन ओवैसी जैसे लोगों को मुस्लिमों का प्रतिनिधी मानकर उसके विचारों को सारे मुसलामानों के राय मान लेना क्या मुसलामानों के साथ अन्याय नहीं होगा? लेकिन मीडिया ने वोट की राजनीती करने वाले ओवैसी की निराधार बयानबाजी को ज्यादा हवा देकर अपनी नासमझी का प्रमाण दिया है। आखिर क्यों मीडिया भारतीय मुसलामानों को अलग नजर से देखती है? क्या आतंकवादी गतिविधियों में केवल हिन्दू ही मारे जाते हैं मुसलमान नहीं?

दोनों कौमों की लड़ाई सामान ही है। दोनों के सुख-दुःख एक ही हैं। आतंकवाद का जितना प्रभाव हिन्दुओं पर पड़ता है उतना ही मुसलामानों या अन्य धर्म के लोगों पर भी पड़ता है। दोनों के सामने बेरोजगारी, गरीबी, महंगाई मुँह फाड़े खड़ी है। वे भी दंगों में मरते और मारे जाते हैं। बम उनके बच्चों को भी अनाथ बनाते हैं। तो फिर मीडिया को क्या जरूरत पडी है कि वो उनको अलग अलग नज़र से देखकर दोनों का बांटने का काम करे? देश की अदालतें जाति या धर्म देखकर फैसले करती हैं, यह कहना तो बिलकुल ही गलत है। फांसी दी जाए या न दी जाए इसके पहलुओं पर विचार करना बेहद आवश्यक है, किन्तु जब तक हमारे देश में यह सजा मौजूद है तब तक किसी की फांसी को साम्प्रदायिक रंग देना कहां की समझदारी है? दिग्विजय सिंह और शशि थरूर तब कहां थे जब कांग्रेस के कार्यकाल में फांसी हुई थी? इसलिए देश की एकता और अखंडता को ठेस पहुंचाने वाले की सज़ा के विरुद्ध खड़े होना, देश के सर्वोच्च न्यायालय तथा महामहीेम राष्ट्रपति के विवेक पर संदेह करना अपने आप में एक अपराध ही है।

डा. कलाम ने एक बार मीडिया विद्यार्थियों को शपथ दिलाते हुए कहा था, ‘‘मैं मीडिया के माध्यम से अपने देश के बारे में अच्छी खबरों को बढ़ावा दूंगा, चाहे वे कहीं से भी संबंधित हों। क्या मीडिया कलाम  साहब को दिए इस वचन को निभा रही है? देश की धर्मनिरपेक्षता का नारा “हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख-ईसाई आपस में सब भाई भाई”, सुनने में और पढ़ने में तो बहुत अच्छा लगता है किन्तु क्या सच में हम इस नारे का सम्मान कर पा रहे हैं? हम बंटे हुए लोग इस देश को कैसे एक रख पाएंगे? सभी धर्म के लोगों में दरार पैदा करने वाली राजनीति हो रही है और मीडिया भी इसे अपने चैनलों पर खूब उछाल रहा है। क्या ऐसा करना सही है? मीडिया अपने धर्म को भूल रही है। मीडिया को आखिर ये अधिकार किसने दिया कि वह ऐसी बयानबाजियों को दिखाए जिससे देश का माहौल बिगड़ सकता है। मीडिया को यह समझना होगा कि उसका काम बहुत ही जिम्मेदारी वाला काम है। मीडिया को आखिर यह कौन समझाएगा कि भारतीय हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों के नायक भारतरत्न कलाम हैं न कि कोई आतंकवादी. मीडिया आतंकवाद को खत्म करने में बहुत बड़ी भूमिका निभा सकता है. बस जरूरत है तो सत्यता, निष्पक्षता और ईमानदारी से काम करने की।

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हत्यारे की फांसी पर ऐसी सियासत किसलिए?

याकूब मेमन, राजनीतिक बहस के लिए एक ऐसा मुद्दा जिसने पूरे देश की राजनीति में उथल पुथल मचा दी है। ऐसा विश्व में शायद ही किसी और देश में होगा कि देश के उस महान इंसान, जिसने देश की देश की सैन्य शक्ति का विश्व भर में लोहा मनवाया हो,  की मृत्यु पर आँखें नम करने की बजाए किसी आतंकवादी की फांसी पर अफ़सोस जताया जा रहा हो। याकूब मेमन को फांसी देने पर देश का सियासती माहौल जितना गरमाया है शायद ही किसी जरूरी गंभीर मुद्दे पर भी कभी ऐसा हुआ हो। याकूब की फांसी का समर्थन करने वाले इतने लोग सामने नहीं आये बल्कि उससे ज्यादा फांसी का विरोध करने वाले निकल आये। केवल विरोध करने तक ही बात सीमित हो तो कड़वा घूँट पी कर मन को समझा लें किन्तु इनमें से कुछ लोगों ने 1993 मुंबई हमलो के दोषी को निर्दोष ही बता दिया। अब लोकतंत्र का इससे बड़ा बड़प्पन क्या होगा के कि देश की जनता उन लोगों को भी झेल रहे है जो सरेआम आतंकवादियों की फांसी का विरोध कर रहे थे।

देश की न्यायपालिका ने भी याकूब मेमन के प्रति काम उदारता नहीं दिखाई। मरने के उपरान्त याकूब के साथ वैसा सलूक नहीं किया गया जैसे अफजल गुरु और अजमल कसाब के साथ हुआ था, बल्कि मेमन का शव उसके भाई के हवाले करदिया गया तथा खुलेआम उसे दफनाने भी दिया गया। देश के मीडिया ने भी याकूब के जनाजे में भीड़ जुटाने में विशेष भूमिका निभाई। टेलीविजन पर पल पल की खबर, याकूब को दफनाने का स्थान, ये सब कुछ सेकिण्ड के अंतराल पर दिखाया जा रहा था। यही वजह रही कि बड़ी तादात में मुस्लिम लोग याकूब के जनाजे में शामिल हो गए। यह कहना बिलकुल भी अतिश्योक्ती नहीं होगा कि देश के जनता में धैर्य कूट कूट कर भरा हुआ है। खासकर उन लोगों के धैर्य की प्रशंसा करनी होगी जिन्होंने मुंबई सीरियल ब्लास्ट में खोये अपने परिजनों के हत्यारे का जनाजा अपने ही शहर में खुलेआम निकलने दिया। याकूब मेमन की फांसी के दिन का हाल बहुत भयानक भी हो सकता था अगर देश की जनता में यह सहनशीलता ना होती। लेकिन यह सहनशीलता कहाँ तक सही है? एक आतंकी के जनाजे में शामिल हुए लोग या उसकी फ़ांसी का विरोध करने वाले लोग क्या इसे देश की जनता की दुर्बलता तो नहीं मान रहे?

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि भारत एक लोकतान्त्रिक देश है। यहाँ पर सबको अपनी बात रखने का अधिकार समान रूप से प्राप्त है। लेकिन क्या इसे देश की न्यायपालिका की कमजोरी समझें या कुछ और कि एक-दो राजनीतिक लोग सरेआम याकूब मेमन की सज़ा को साम्प्रदायिक रंग देकर उसे हिन्दू-मुस्लिम का मुद्दा बना देते है। क्या यह खतरनाक साबित नहीं हो सकता? क्या इससे देश में हिंसात्मक माहौल पैदा नहीं हो सकता? यदि हां तो ऐसे लोगों पर कार्यवाही का कोई प्रावधान नहीं है? कुछ पार्टियों के नेताओं ने याकूब की फांसी के आधार को मुस्लिम धर्म के साथ जोड़कर देश के माहौल को और भी गर्म कर दिया। क्या यह सही है? क्या न्यायपालिका को इस पर कोई कार्यवाही नहीं करनी चाहिए थी? जो लोग चिल्ला चिल्लाकर ये आरोप लगा रहे थे कि याकूब को फांसी इसलिए दी जा रही है क्यूंकि वह एक मुसलमान है, उनके इन आरोपों का कोई वजूद नहीं है। यदि ऐसा होता तो जिन लोगों ने 1993 में मुंबई हमले के के लिए बम फिट किये थे वो सब भी मुसलमान थे तो उनको फांसी क्यों नहीं दी गयी। इन बम फिट करने वालो को मुसलमान होने के बावजूद फांसी नहीं दी गयी तथा उस हमले का षड्यंत्र रचने वाले को फांसी दी गयी। जिसका अपराद जितना बड़ा होता है उसे उसके अनुसार ही दंड भी मिलता है। ना कि उसे इस आधार पर देखा जाता है कि वो हिन्दू है या मुस्लमान। यदि कोई दहशतगर्द हिन्दू होता तो कानून उसे भी सज़ा-ए-मौत ही देता। इसी का उदाहरण है कि महात्मा गांधी तथा इंदिरा गांधी की ह्त्या करने वालो को भी फांसी के फंदे पर लटकाया गया था। क्या वो मुसलमान थे?   यदि याकूब को फांसी की सज़ा देने की वजह उसका धर्म होता तो देश के कुछ बुद्धिजीवी लोग तथा बड़े बड़े वकील उसे बचाने के लिए अपनी साख दांव पर नहीं लगाते। जबकि ये लोग तो मुसलमान भी नहीं थे। इन लोगों को देशद्रोही कहना भी गलत होगा क्यूंकि इन लोगों के तर्क में भी कुछ तो दम था। और साथ ही इन लोगों ने अपने तर्क का आधार दया और करुणा को बनाया था। इन लोगों का तर्क इसलिए भी महत्वपूर्ण बन जाता है क्यूंकि यदि याकूब भारत सरकार को उस साजिश में पाकिस्तान, दाऊद इब्राहिम, टाइगर मेमन का हाथ होने के बारे में नहीं बताता तो सरकार आज तक अँधेरे में ही तीर चला रही होती।

भारतीय खूफिया एजेंसी “रॉ” के वरिष्ठ अधिकारी बहुकुटुम्बी रमन द्वारा 2007 में लिखे लेख के अनुसार याकूब मेमन मुखबिर बन गया था तथा देश को कई खूफिया जानकारियां भी उपलब्ध करवा रहा था। इसलिए उसे छोड़ देना चाहिए था। लेकिन बी रमन के लेख ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं कि उन्होंने ये लेख 2007 में लिखा था तो अबतक छपवाया क्यों नहीं? उन्हें किस बात का डर था? और अब बी रमन ने जब ये लेख छपवाया है तो इसे सत्य कैसे मन लिया जाए? इसके पीछे तथ्य क्या है? मुकददमे के दौरान भी सरकार या किसी भी खुफिया एजेंसी ने याकूब द्वारा जानकारी उपलब्ध करवाने की कोई बात कभी नहीं कही ना ही उसे मुखबिर मानकर माफ़ करने की बात कभी कही। वही अगर अदालत की बात करें तो उसने याकूब को न्याय दिलाने के लिए 22 साल तक इंतज़ार जरूर किया। ऐसा पहले किसी भी अपराधी के साथ नहीं हुआ। फांसी वाले दिन भी सुबह 3 बजे अदालत लगायी गयी। क्या अदालत भविष्य में इतना कष्ट किसी गरीब पीड़ित को न्याय दिलाने के लिए करेगी।

याकूब मेमन, जिसने 12 मार्च, 1993 को पूरे देश को धमाकों से दहला दिया था वो किस आधार पर दया की भीख मांग रहा था? 257 लोगों का हत्यारा खुद मरने से क्यों डर रहा था? जिस प्रकार वह फांसी की सज़ा रोकने के लिए गिड़गिड़ा रहा था, इसने उसे बहुत कायर इंसान साबित कर दिया। यदि याकूब को माफ़ कर दिया जाता तो उन 10 कैदियों को कैसा लगता जिन्हें इन मेमन भाइयों ने आतंकवादी बनने के लिए प्रेरित किया था। जो अब जेल में उम्रकैद की सज़ा भुगत रहे हैं। खुद को फांसी से बचाने के लिए अपनी दलीलों में उसने बच्चों की शिक्षा जैसा भावनात्मक पैंतरा भी इस्तेमाल किया। उसने कहा कि वह जेल में लोगों को शिक्षा दे रहा है और वह अब सुधर चुका है। वह एक स्कूल खोलना चाहता है। बच्चों को पढ़ाना चाहता है। लेकिन उसके यह सारे तर्क उसके गुनाहों को कम नहीं करते। यदि क़ानून उसे माफ़ कर देता तो कानून भी उसके गुनाहों का भागीदार बन जाता साथ ही उन लोगों के दुःख का हिस्सेदार भी जिन्होंने मुंबई सीरियल धमाकों में अपना सब कुछ खो दिया। लोगों में भी यही सन्देश जाता कि कानून केवल बलवान का ही हिमायती होता है, फिर चाहे गरीब को इन्साफ मिले या ना मिले। याकूब मेमन को सच में अपने किये पर पछतावा था या वो सच में ही सुधर चुका था इस बात की गारंटी कोई भी नहीं ले सकता था। यदि उसे अपने किये पर सच में ही दुःख होता तो वो साहस के साथ खड़ा होकर अपने किये गए गुनाह को कबूल करता। फिर कानून उसे जो भी सज़ा देना मुनासिफ समझता, दे देता।

दहशतगर्दों के लिए केवल मृत्युदंड ही उचित

देश के सर्वोच्च न्यायालय ने देश के स्वाभिमान को बरकरार रखते हुए ये बता दिया कि कानून किसी भी तरफ से लाचार नहीं है।  देश के कुछ गिने चुने बुद्धिजीवियों ने भले ही इन्साफ के तराजू को झुकने के लिए मजबूर करने की कोशिश की हो लेकिन देश के सबसे बड़े न्यायालय ने ऐसा होने नहीं दिया। गर्व की बात है कि इन्साफ अभी भी है और जिसने भी देश की शान्ति भंग करने का प्रयत्न किया है, उसके लिए कड़ी से कड़ी सज़ा भी निश्चित है।

चारों तरफ हड़कम्प मचा हुआ है। बेचैनी का माहौल है। किन्तु प्रशन यह उठता है कि किसके लिए है ये इतनी बेचैनी? क्यों इतनी चिंता की जा रही है? वो भी उस आतंकी के लिए जिसने सारे देशवासियों के दिल को धमाकों की गूँज से दहला दिया था। जिसने अपने परिवार के सदस्यों को दहशत फैलाने के नापाक मकसद में लगा दिया हो। और दहशत फैलाने के लिए उसी जगह को चुना जहाँ पर अधिकतर स्कूल के बच्चे मौजूद हों। मुंबई शहर के सेंचुरी बाजार की ही घटना पर गौर कर ले तो आपकी आत्मा कांप जाएगी कि वहां याकूब मेमन और उसके साथियों ने इस बात की रैकी(जांच) की थी कि धमाका करने के लिए किस जगह पर बारूद भरा जाए ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग मारे जा सकें। याकूब ने बाजार के मैनहोल में विस्फोटक भरवाया था, जिसके ऊपर से स्कूल बस के गुजरते ही बम फटा था। सिर्फ इसी जगह पर मरने वालों में 100 से अधिक बच्चे, महिलाएं तथा कुछ बुजुर्ग भी थे।

यह बात नहीं समझ आती कि हम दिन रात याकूब की सज़ा-ए-मौत पर चिंता जाहिर करके, एक आतंकवादी पर दया दिखाकर आखिर साबित क्या करना चाहते थे? क्या उन धमाकों में मारे गए लोगों की चीखों को अनसुना किया जा सकता है? 22 वर्ष बीत गए, किसी को नहीं पता था के याकूब कहाँ है, उस पर कौन-कौन सी धाराएं लगाई गयी हैं? अब अचानक से कानून में कमियां निकलने वाले समझदार लोग पता नहीं कहा से सामने आ गए। सबको यह समझना चाहिए कि कानून आखिरकार न्याय के लिए बना है। किसी का जेल में व्यवहार अच्छा है, वो जेल में लोगों को पढ़ा लिखा रहा है  तो इसका अर्थ यह तो कतई नहीं है कि उसने जितनी भी हत्याएं की हों उसके लिए उसे सख्त सज़ा ना दी जाये। तो फिर क्यों ऐसा माहौल पैदा करने की कोशिश की जा रही है जैसे फांसी किसी आतंकवादी को नहीं बल्कि किसी निर्दोष को दी जा रही हो। दहशतगर्दों के लिए तो मृत्युदंड ही उचित सज़ा है।

इस बात में कोई संदेह नहीं है और ना ही होना चाहिए कि न्याय पर पहला अधिकार पीड़ित का है। लेकिन किसी ने भी यह जानना जरूरी समझा कि मुंबई बम धमाकों में जो लोग शिकार हुए थे उन्हें इन्साफ मिला या नहीं? उनके दर्द के बारे में सोचने वाला कोई भी नहीं है, ना ही उन लोगों के पास जा कर किसी ने यह जानने की कोशिश की कि याकूब मेमन की फांसी को वो किस नज़र से देखते हैं?  बस सबको उस दहशतगर्द आतंकी को बचाने में दिलचस्पी थी। बड़ी तादात में लोग, कुछ पार्टियों के नेता और खुद को कुछ ज्यादा ही समझदार समझने वाले बुद्धिजीवी लोगों में केवल इस देशद्रोही को बचाने की होड़ लगी रही। ये सब ड्रामा हुआ भी तब जब देश के सर्वोच्च न्यायालय की ही विस्तारिक बैंच के जज याकूब मेमन की फांसी को रोकने के लिए साफ़ मना कर चुके हों। देश के महामहीम राष्ट्रपति भी दया याचिका को खारिज कर चुके हों।

पूरे देश को दहला देने वाले आतंकी के बचाने के लिए दया याचिका को कभी राष्ट्रपति के पास फिर राष्ट्रपति के पास, फिर राज्यपाल फिर सर्वोच्च न्यायालय पता नहीं कहाँ-कहाँ ले जाया गया। काश किसी पीड़ित के लिए कोई ऐसा कर पाता। किसी गरीब को न्याय दिलाने के लिए कोई इतनी दौड़ धूप करता। किन्तु गरीब पीड़ित तो सालों तक केवल अर्जियां ही दाखिल करता रह जाता है। देश के सबसे बड़े न्यायालय को रात भर जारी रखने में सफल क़ानून के रक्षक किसी पीड़ित को इन्साफ दिलाने के लिए भविष्य में ऐसा दोबारा कर पाये तो इस बड़ी बात कोई और नहीं हो सकती। लेकिन फिलहाल तो ये सोचना भी मुश्किल हो रहा है कि कभी ऐसा होगा।

अभी फांसी पर दया याचिका को एक जगह से दूसरी जगह पर घुमाया ही जा रहा था कि एक नए मुद्दे ने टूल पकड़ लिया। याकूब को गिरफ्तार नहीं किया गया था उसने आत्मसमर्पण(सरेंडर) किया था। पाकिस्तान के खिलाफ सबूत जुटाने में याकूब का बेहद योगदान था। इसलिए उसे फांसी की सज़ा नहीं दी जानी चाहिए। लेकिन अब सीधी सी बात ये है कि किसी को भी यह अधिकार दिया किसने? क्या पाकिस्तान के विरुद्ध सबूत जुटा देने का मतलब ये है कि याकूब मेमन द्वारा की गयी 257 हत्याएं भी माफ़। हद है।

जो लोग सज़ा-ए-मौत की माफी के पक्ष में थे, उनके बारे में कुछ भी नहीं कहा जाए सकता कि देश के प्रति उनकी भावनाएं ज़िंदा है या मर चुकी हैं किन्तु इतना जरूर पता है कि देश इसे कभी माफ़ नहीं कर सकता। खून के लाल रंग में लथपथ मुंबई की वो 12 मार्च, 1993 की तस्वीर को कोई भी नहीं भुला सकता।