राजनीति, प्रतिद्वंद्वी बनकर कीजिये दुश्मन बनकर नहीं

राजनीति एक ऐसा विशाल सागर है जिसमें छोटे बड़े राजनेता अपने प्रतिद्वन्द्वियों को हराकर सत्ता अपने हाथ में रखना चाहते हैं। राजनीतिक लिहाज़ से भले ही उनमें कई मतभेद हों लेकिन निजी तौर पर उनमें मनमुटाव नहीं होता। लेकिन भारत की मौजूदा राजनीति इसके बिलकुल विपरीत है। नरेंद्र मोदी बनाम सोनिया गांधी इसी बात का सबसे माकूल उदाहरण है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच मनमुटाव अब तक राजनीतिक रैलियों में ही नजर आता था लेकिन अब तो संसद में भी इस मनमुटाव ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है। इन दोनों राजनीतिक दिग्गजों का किसी भी बात पर आपस में असहमति जताना इस बात की पुष्टि करता है कि यह अनबन केवल राजनीतिक नहीं है बल्कि इसके पीछे कोई निजी कारण है।

हाल ही में मानसून का बर्बाद हुआ सत्र भी इसी बात की और इशारा करता है कि यह केवल पक्ष बनाम विपक्ष अथवा कांग्रेस बनाम भाजपा वाली राजनीती का नतीजा नहीं है, बल्कि यह ऐसे राजनेताओं के मनमुटाव का प्रतिफल है जो एक दूसरे को कतई पसंद नहीं करते हैं। इन दोनों के झगडे को देखकर तो ऐसा ही लगता है कि ये दोनों राजनेता एक दूसरे को राजनीतिक रूप से खत्म करने पर तुले हैं। यही कारण है कि ये दोनों दिग्गज राजनेता ना तो किसी मुद्दे पर सहमत होते हैं और ना ही आपस में कोई कामकाजी रिश्ता विकसित कर पाते हैं, भले ही उसमें जनता का हित ही क्यों ना हो। मानसून सत्र में देश को जो नुकसान हुआ, मोदी बनाम सोनिया उसका एकमात्र कारण है। इन दोनों की जिद के कारण ही संसद में लगातार गतिरोध की  परिस्थिति बनी रही।

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हालांकि राजनीति में ऐसा मनमुटाव पहली बार देखने को नहीं मिला। राज्य विधानसभाओं में ऐसा पहले भी देखा जा चुका है।  मायावती बनाम मुलायम सिंह यादव, जयललिता बनाम करूणानिधि तथा और भी ऐसे कई किस्से है जिनमें राजनीति के दिग्गजों में निजी मतभेद देखा गया है। मोदी और सोनिया की इस दुश्मनी का लंबा इतिहास रहा है। वर्ष 2007 के गुजरात चुनाव में सोनिया ने 2002 के दंगों को तूल देकर मोदी पर “मौत का सौदागर” होने की टिप्पणी कर दी थी। लेकिन नरेंद्र मोदी ने भी इसके बदले में कोई कसर नहीं छोड़ी। 2002 में उन्होंने सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को उठाकर आसान जीत दर्ज की थी। कुछ वर्ष पहले भी मोदी  ने कांग्रेस नेता को अपमानजनक ढंग से सम्बोधित किया था। इन दोनों का एक दूसरे के प्रति रवैया केवल राजनीतिक मतभेद तो नहीं हो सकता। इन दोनों की यह लड़ाई चुनावी हार जीत से बहुत परे चली गयी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषणों में कई बार कांग्रेस मुक्त भारत की बात की है। इससे इस बात को तो साफ़ तौर पर पर देखा जा सकता है कि वे कांग्रेस को केवल पराजित ही नहीं करना चाहते हैं बल्कि खत्म कर देना चाहते हैं। आरएसएस पृष्ठभूमि से जुड़े होने के कारण भी मोदी हमेशा से ही जवाहरलाल नेहरू को नापसंद करते आये हैं। इसकी झलक उनके भाषणों में साफ दिखाई देती है। उन्होंने अपने भाषणों में नेहरू के योगदान को कभी महत्त्व नहीं दिया, जबकि सरदार पटेल, सुभाष चन्द्र बोस, लाल बहादुर शास्त्री तथा महात्मा गांधी का गुणगान करते उन्हें कई बार देखा गया है। उनके भाषणों से ऐसा लगता है मानो मोदी नेहरूवादी विरासत को देश की राजनीति से हमेशा के लिए मिटा देना चाहते हों। लेकिन वे ये बात भी भूल रहे हैं कि किसी की राजनीतिक विरासत को ख़त्म कर देना भाषण देने जितना आसान काम नहीं है।

नरेंद्र मोदी भले ही जवाहरलाल नेहरू को पसंद ना करते हों लेकिन इस बात को झुठला नहीं सकते की देश का पहला प्रधानमंत्री होने का गौरव उन्हें ही प्राप्त है और राजनीति में उनके योगदान भाषणों में उनका नाम न लेने से कम नहीं होगा। इसलिए उनके नाम को देश की राजनीति से मिटाना समझदारी का नहीं अपितु द्वेष का प्रमाण होगा। सोनिया गांधी ने भी समय रहते शायद इसे भांप लिया है, तभी तो अचानक कांग्रेस की कमान अपने हाथों में ले ली है, साथ ही पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भरते हुए उन्हें मोदी से ना डरने के लिए प्रेरित भी करती नज़र आ रही हैं। संसद में मानसून सत्र के दौरान उनका आक्रोश भरा रूख इस बात की पुष्टि करता है। उनके सख्त रवैये ने इस बात को तो साफ़ बता दिया कि खुद के संरक्षण तथा परिवार की विरासत बचने के लिए वे कुछ भी कर सकती हैं। मोदी को कड़ी चुनौती देने के लिए इसीलिए सोनिया गांधी बार बार मोदी की धर्मनिरपेक्षता को कटघरे में खड़ा कर देती है। आरएसएस से जुड़े होने के कारण मोदी को भी इस पर मौन रहना पड़ता है।

मनमुटाव की वजह कोई भी हो। दलील कोई भी दी जा सकती है। चाहे मोदी, सोनिया गांधी के विदेशी मूल की होने की अपनी नफरत को पचा नहीं पा रहे हो या दूसरी तरफ सोनिया गांधी मोदी के प्रधानमंत्री बनने को अभी तक स्वीकार नहीं कर पायी हो। असलियत यही है कि 2002  से चली आ रही इस लड़ाई में देश का बहुत नुकसान हो चुका है। नरेंद्र मोदी अब बहुमत दल कि सरकार के प्रधानमंत्री है तथा सोनिया गांधी सबसे बड़े विपक्ष दल कि अध्यक्ष। दोनों को राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बनकर काम करना होगा दुश्मन बनकर नहीं। दोनों देश कि राजनीति में महत्वपूर्ण रुतबा रखते हैं। इसलिए दोनों को एक दूसरे से व्यवहार करना आना चाहिए। एक दूसरे के प्रति लगातार मनमुटाव उत्पन्न करके संसदीय व्यवस्था को शर्मसार करने कि बजाये मिलकर देश कि राजनीति में अपना योगदान दें, जिससे देश नुकसान से भी बच जाएगा और जनता के हित के बारे में भी सोचा जा सकेगा।

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